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Rohan Hamirpuriya
us ke kooche se jab bhi guzarte hain
us ke kooche se jab bhi guzarte hain | उस के कूचे से जब भी गुज़रते हैं
- Rohan Hamirpuriya
उस
के
कूचे
से
जब
भी
गुज़रते
हैं
ज़ेहन
में
बादल
ग़म
के
उभरते
हैं
काम
न
आती
है
बंदगी
कोई
आशिक़
जब
वादे
से
मुकरते
हैं
उस
के
हुस्न
का
कहना
ही
क्या
यारों
बिखरता
हूँ
मैं
जब
वो
सँवरते
हैं
इन
ख़्वाबों
को
सहेज
तो
लूँ
मगर
टूटे
इक
तो
बाक़ी
बिखरते
हैं
शा'इरी
वो
फ़न
है
यारों
जिस
से
आशिक़ी
के
अंदाज़
निखरते
हैं
- Rohan Hamirpuriya
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ये
हक़ीक़त
है,
मज़हका
नहीं
है
वो
बहुत
दूर
है,
जुदा
नहीं
है
तेरे
होंटों
पे
रक़्स
करता
है
राज़
जो
अब
तलक
खुला
नहीं
है
जान
ए
जांँ
तेरे
हुस्न
के
आगे
ये
जो
शीशा
है,
आइना
नहीं
है
क्यूँ
शराबोर
हो
पसीने
में
मैं
ने
बोसा
अभी
लिया
नहीं
है
उस
का
पिंदार
भी
वहीं
का
वहीं
मेरे
लब
पर
भी
इल्तेजा
नहीं
है
जो
भी
होना
था
हो
चुका
काज़िम
अब
किसी
से
हमें
गिला
नहीं
है
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Kazim Rizvi
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हुस्न
ने
शौक़
के
हंगा
में
तो
देखे
थे
बहुत
इश्क़
के
दावा-ए-तक़दीस
से
डर
जाना
था
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Asrar Ul Haq Majaz
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हुस्न
बख़्शा
जो
ख़ुदा
ने
आप
बख़्शें
दीद
अपनी
आरज़ू–ए–चश्म
पूरी
हो
मुकम्मल
ईद
अपनी
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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उम्र
भर
मिलने
नहीं
देती
हैं
अब
तो
रंजिशें
वक़्त
हम
से
रूठ
जाने
की
अदा
तक
ले
गया
Fasih Akmal
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शाम
भी
थी
धुआँ
धुआँ
हुस्न
भी
था
उदास
उदास
दिल
को
कई
कहानियाँ
याद
सी
आ
के
रह
गईं
Firaq Gorakhpuri
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वफ़ा
का
ज़ोर
अगर
बाज़ुओं
में
आ
जाए
चराग़
उड़ता
हुआ
जुगनुओं
में
आ
जाए
खिराजे
इश्क़,
कहीं
जा
के
तब
अदा
होगा
हमारा
ख़ून
अगर
आँसुओं
में
आ
जाए
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Hashim Raza Jalalpuri
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पाने
को
तुझको
मैंने
तहज्जुद
भी
की
अदा
तू
मिल
गई
तो
फ़र्ज़
भी
बैठा
हूँ
छोड़
कर
Wajid Husain Sahil
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तू
इस
तरह
से
मिला
फिर
मलाल
भी
न
रहा
तेरे
ख़याल
में
अपना
ख़याल
भी
न
रहा
कुछ
इस
अदास
झुकी
थी
हया
से
आँख
तेरी
हमारी
आँख
में
कोई
सवाल
भी
न
रहा
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Subhan Asad
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अल्लाह
अल्लाह
हुस्न
की
ये
पर्दा-दारी
देखिए
भेद
जिस
ने
खोलना
चाहा
वो
दीवाना
हुआ
Arzoo Lakhnavi
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मैं
तो
मुश्ताक़
हूँ
उस
दिन
का
अज़ल
से
'ज़ामी'
कब
बपा
हश्र
हो
कब
उन
का
मैं
जल्वा
देखूँ
Parvez Zaami
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तेरी
ख़ुदाई
से
नहीं
इंकार
ऐ
ख़ुदा
पाने
की
आरज़ू
है
जिसे
वो
दिला
मुझे
Rohan Hamirpuriya
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हम
से
कहती
रहती
है
शादी
का
और
'आशिक़
ग़ैरों
को
बताती
है
दफ़्तर
से
वापिस
जल्दी
आता
हूँ
बिन
मेरे
माँ
खाना
न
खाती
है
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Rohan Hamirpuriya
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ख़ुद
का
ही
मैं
अज़ीज़
ठहरा
हाँ
अना
का
मरीज़
ठहरा
है
वफ़ादार
घर
का
कुत्ता
आदमी
बद-तमीज़
ठहरा
जिस
को
बातिल
था
माना
हम
ने
वो
तो
हर
दिल
अज़ीज़
ठहरा
जिन
को
उर्दू
का
फ़न
अता
हैं
लहजा
उन
का
लज़ीज़
ठहरा
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Rohan Hamirpuriya
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ये
रब्त
कब
मिटे
है
यूँँ
मिटाने
से
ये
आग
है
जो
बढ़ती
है
बुझाने
से
उसे
मैं
हाल-ए-दिल
बताता
तो
मगर
वो
बाज़
आते
ही
नहीं
सताने
से
उसे
बता
दे
हाल
मेरा
भी
कोई
वो
कब
समझता
है
मेरे
बताने
से
रक़ीबों
से
मिलाता
है
वो
हाथ
गर
क़रीब
आए
मेरे
भी
बहाने
से
न
बाक़ी
दिल
में
आरज़ू
रही
कोई
मिला
ही
क्या
है
यारों
इस
ज़माने
से
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Rohan Hamirpuriya
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सुनते
हैं
रात
होती
है
सोने
के
लिए
हमको
तो
रास
आई
है
रोने
के
लिए
वो
थक
चुका
है
नफ़रत
का
गीत
गा
के
तो
राज़ी
है
बीज
उल्फ़त
का
बोने
के
लिए
मैं
आगे
बढ़
गया
था
मंज़िल
की
चाह
में
बाक़ी
नहीं
है
कुछ
भी
अब
खोने
के
लिए
आसाँ
नहीं
मिटाने
ये
दाग़
यादों
के
आँसू
बहाने
पड़ते
हैं
धोने
के
लिए
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Rohan Hamirpuriya
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