ik tamaasha-e-aqeedat hi banaa rakha hai | इक तमाशा-ए-अक़ीदत ही बना रक्खा है

  - Kaif Uddin Khan
इकतमाशा-ए-अक़ीदतहीबनारक्खाहै
वरनाइसदैरमेंक्याबुतकेसिवारक्खाहै
जिस्मतोपहलेहीज़िंदानथाउसपरमैने
दिलकोभीहल्क़ा-ए-ज़ंजीरबनारक्खाहै
तूबुझाएगातोयेऔरभड़कजाएगी
मैंनेजिसआगकोसीनेमेंजलारक्खाहै
शौक़-ए-दीदारज़रूरीहैमुझेवैसेमैं
जानताहूँतेरीतस्वीरमेंक्यारक्खाहै
काटभीसकतीहैवोलश्कर-ए-दुश्मनइससेे
उसनेजोआँखकोशमशीरबनारक्खाहै
आगदामनमेंतुम्हारेलगाजाएवही
आजकलतुमनेजिसेअपनाख़ुदारक्खाहै
  - Kaif Uddin Khan
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