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Kaffir
nazm-shero-shaayri to bad-dilon kii baat hai
nazm-shero-shaayri to bad-dilon kii baat hai | नज़्म-शेरो-शायरी तो बद-दिलों की बात है
- Kaffir
नज़्म-शेरो-शायरी
तो
बद-दिलों
की
बात
है
झेलना
तूफ़ाँ
अभी
क्या
साहिलों
की
बात
है
ज़ख़्म
देकर
क़त्ल
तो
काफ़िर
सभी
करते
मगर
बा-मोहब्बत
क़त्ल
माहिर
क़ातिलों
की
बात
है
- Kaffir
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ये
उसकी
मेहरबानी
है
वो
घर
में
ही
सँवरती
है
निकल
आए
जो
महफ़िल
में
तो
क़त्ल-ए-आम
हो
जाए
Ashraf Jahangeer
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इक
अव्वल
दर्जे
का
पाक
इक
माहिर
है
मन
तो
तुझ
में
रमता
है
दिल
काफ़िर
फिर
है
अपनी
सोचो
क़त्ल
तुम्हें
करना
भी
है
बन्दे
का
तो
क्या
है
बन्दा
हाज़िर
है
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Vikram Gaur Vairagi
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तेग़-बाज़ी
का
शौक़
अपनी
जगह
आप
तो
क़त्ल-ए-आम
कर
रहे
हैं
Jaun Elia
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गुजर
चुकी
जुल्मते
शब-ए-हिज्र,
पर
बदन
में
वो
तीरगी
है
मैं
जल
मरुंगा
मगर
चिरागों
के
लो
को
मध्यम
नहीं
करूँगा
यह
अहद
लेकर
ही
तुझ
को
सौंपी
थी
मैंने
कलबौ
नजर
की
सरहद
जो
तेरे
हाथों
से
कत्ल
होगा
मैं
उस
का
मातम
नहीं
करूँगा
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Tehzeeb Hafi
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है
किसी
जालिम
उदू
की
घात
दरवाज़े
में
है
या
मसाफ़त
है
नई
या
रात
दरवाज़े
में
है
जिस
तरहा
उठती
है
नजरें
बे-इरादा
बार-बार
साफ़
लगता
है
के
कोई
बात
दरवाजे
में
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Farhat Abbas Shah
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वो
क़त्ल
कर
के
मुझे
हर
किसी
से
पूछते
हैं
ये
काम
किसने
किया
है,
ये
काम
किस
का
था?
Dagh Dehlvi
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हम
आह
भी
करते
हैं
तो
हो
जाते
हैं
बदनाम
वो
क़त्ल
भी
करते
हैं
तो
चर्चा
नहीं
होता
Akbar Allahabadi
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उस
के
क़त्ल
पे
मैं
भी
चुप
था
मेरा
नंबर
अब
आया
मेरे
क़त्ल
पे
आप
भी
चुप
हैं
अगला
नंबर
आपका
है
Nawaz Deobandi
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पूछे
हैं
वजह-ए-गिरिया-ए-ख़ूनी
जो
मुझ
सेे
लोग
क्या
देखते
नहीं
हैं
सब
उस
बे-वफ़ा
का
रंग
Meer Taqi Meer
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हमारा
इश्क़
इबादत
का
अगला
दर्जा
है
ख़ुदा
ने
छोड़
दिया
तो
तुम्हारा
नाम
लिया
ग़मों
से
बैर
था
सो
हमने
ख़ुद-कुशी
कर
ली
शजर
ने
गिर
के
परिंदों
से
इन्तेक़ाम
लिया
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Balmohan Pandey
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प्यासे
का
मान
क्या
है
दुनिया
से
काम
क्या
है
ये
प्यास
ही
न
हो
गर
क्या
दरिया
जाम
क्या
है
Kaffir
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अगर
तुम
पास
बैठो
शे'र
उसको
इक
सुना
देना
उसे
अच्छा
लगे
तो
एक
दो
ग़ज़लें
भी
गा
देना
अगर
वो
पूछ
ले
तुम
से
कि
ये
जज़्बात
किसके
हैं
बताना
एक
शायर
नाम
तुम
काफ़िर
बता
देना
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Kaffir
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रोज़
शाम
हम
बैठे
उसके
ख़्वाब
में
डूबे
फिर
उसे
भुलाना
था
तो
शराब
में
डूबे
क्या
सवाल
पूछा
था
क्या
ही
फ़र्क़
पड़ता
है
हम
तो
सिर्फ़
'काफ़िर'
अब
इक
जवाब
में
डूबे
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Kaffir
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वैसे
समुंदर
हूँ
मगर
ख़ुद
को
मैं
क़तरा
भी
मेरा
हासिल
नहीं
वो
भी
मेरा
होकर
ज़रा
सा
मेरे
हिस्से
में
कभी
शामिल
नहीं
मैं
गर
कहूँ
ये
रात
बाक़ी
है
ज़रा
सा
ठहर
मेरी
पलकों
पर
काफ़िर
वो
तो
कहता
है
मेरी
ये
नज़र
अब
चाँद
के
क़ाबिल
नहीं
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Kaffir
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है
आख़िरी
ये
इश्क़
है
हद
साँस
आख़िरी
हो
मौत
तेरी
बाँहों
में
जन्नत
भी
लाज़मी
ऐसी
मिसाल
दूँ
ख़ुदा
को
नाम
तेरा
दूँ
तू
शा'इरी
है
तुझ
सेे
मेरा
इश्क़
काफ़िरी
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Kaffir
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