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Saurabh Yadav Kaalikhh
meri zindagi men khushi ka thikaana nahin hai
meri zindagi men khushi ka thikaana nahin hai | मेरी ज़िंदगी में ख़ुशी का ठिकाना नहीं है
- Saurabh Yadav Kaalikhh
मेरी
ज़िंदगी
में
ख़ुशी
का
ठिकाना
नहीं
है
यहाँ
मैं
किसी
का
नहीं
कोई
मेरा
नहीं
है
- Saurabh Yadav Kaalikhh
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है
ख़ुशी
इंतिज़ार
की
हर
दम
मैं
ये
क्यूँँ
पूछूँ
कब
मिलेंगे
आप
Nizam Rampuri
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इन्हीं
ग़म
की
घटाओं
से
ख़ुशी
का
चाँद
निकलेगा
अँधेरी
रात
के
पर्दे
में
दिन
की
रौशनी
भी
है
Akhtar Shirani
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मैं
ने
आबाद
किए
कितने
ही
वीराने
'हफ़ीज़'
ज़िंदगी
मेरी
इक
उजड़ी
हुई
महफ़िल
ही
सही
Hafeez Banarasi
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मुझे
ख़बर
नहीं
ग़म
क्या
है
और
ख़ुशी
क्या
है
ये
ज़िंदगी
की
है
सूरत
तो
ज़िंदगी
क्या
है
Shadan Ahsan Marehrvi
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ये
तुमने
कैसा
बना
कर
हमें
किया
है
गुम
ख़ुशी
से
झूम
उठेगा
जिसे
मिलेंगे
हम
Swapnil Tiwari
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शबो
रोज़
की
चाकरी
ज़िन्दगी
की
मुयस्सर
हुईं
रोटियाँ
दो
घड़ी
की
नहीं
काम
आएँ
जो
इक
दिन
मशीनें
ज़रूरत
बने
आदमी
आदमी
की
कि
कल
शाम
फ़ुरसत
में
आई
उदासी
बता
दी
मुझे
क़ीमतें
हर
ख़ुशी
की
किया
क्या
अमन
जी
ने
बाइस
बरस
में
कभी
जी
लिया
तो
कभी
ख़ुद-कुशी
की
ग़मों
को
ठिकाने
लगाते
लगाते
घड़ी
आ
गई
आदमी
के
ग़मी
की
ये
सारी
तपस्या
का
कारण
यही
है
मिसालें
बनें
तो
बनें
सादगी
की
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Aman G Mishra
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गाहे
गाहे
बस
अब
यही
हो
क्या
तुम
सेे
मिलकर
बहुत
ख़ुशी
हो
क्या
Jaun Elia
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ख़ुदा
का
शुक्र
अदा
कर
वो
बे-वफ़ा
निकला
ख़ुशी
मना
कि
तिरी
जान
की
बहाली
हुई
Shakeel Jamali
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फिर
इस
के
बाद
मनाया
न
जश्न
ख़ुश्बू
का
लहू
में
डूबी
थी
फ़स्ल-ए-बहार
क्या
करते
Azhar Iqbal
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तुम्हें
हम
भी
सताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
तुम्हारा
दिल
दुखाने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
हमें
बदनाम
करते
फिर
रहे
हो
अपनी
महफ़िल
में
अगर
हम
सच
बताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
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Santosh S Singh
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यहाँ
चेहरे
सभी
जैसे
भरी
‘कालिख़’
बचे
कुछ
साफ़
उन
में
रंग
भरने
दो
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Saurabh Yadav Kaalikhh
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दिल-ओ-जान
की
ख़ूब
बाज़ी
लगाई
बढ़ाते
रहे
हारकर
ज़िंदगी
भर
ख़ुदा
और
कितना
रहूँ
मैं
परेशाँ
क़यामत
रही
हम
सेफ़र
ज़िंदगी
भर
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Saurabh Yadav Kaalikhh
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आक़िबत
तक
आदमी
में
सिर्फ़
पत्थर
रह
गया
देख
कर
हैरान
हूँ
ये
लाश
डूबी
क्यूँँ
नहीं
Saurabh Yadav Kaalikhh
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न
तारीख़
बदली
न
ही
हाल
बदला
न
बदली
अदाऍं
न
ये
साल
बदला
मेरा
शहर
बदला
मेरा
गाँव
बदला
न
ही
लोग
बदले
न
सुरताल
बदला
सड़क
भर
गई
लोग
हैं
अब
ज़ियादा
फ़लक
में
परिंदों
ने
क्यूँँ
हाल
बदला
समुंदर
किनारा
टहलते
जिगर
हम
दिया
था
मुझे
जो
न
रूमाल
बदला
बहुत
प्यार
से
यार
भेजी
है
तुमको
ख़बरदार
जो
मख़मली
शाॅल
बदला
चलो
इम्तिहाँ
बस
करो
मान
जाओ
न
कालिख़
न
लिखना
न
ही
काल
बदला
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Saurabh Yadav Kaalikhh
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आजकल
ये
इश्क़
बीमारी
यहाँ
घर
घर
चले
मय-कदे
जाने
की
तैयारी
यहाँ
घर
घर
चले
Saurabh Yadav Kaalikhh
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