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Saurabh Yadav Kaalikhh
kiya bas idhar se udhar zindagi bhar
kiya bas idhar se udhar zindagi bhar | किया बस इधर से उधर ज़िंदगी भर
- Saurabh Yadav Kaalikhh
किया
बस
इधर
से
उधर
ज़िंदगी
भर
भटकते
रहे
दर
बदर
ज़िंदगी
भर
- Saurabh Yadav Kaalikhh
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आँख
की
बेबसी
दिल
का
डर
देखना
तुम
किसी
दिन
ग़रीबों
का
घर
देखना
Alankrat Srivastava
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डर
हम
को
भी
लगता
है
रस्ते
के
सन्नाटे
से
लेकिन
एक
सफ़र
पर
ऐ
दिल
अब
जाना
तो
होगा
Javed Akhtar
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तेरे
दर
से
जब
उठ
के
जाना
पड़ेगा
ख़ुद
अपना
जनाज़ा
उठाना
पड़ेगा
Khumar Barabankvi
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रुके
रुके
से
क़दम
रुक
के
बार
बार
चले
क़रार
दे
के
तिरे
दर
से
बे-क़रार
चले
Gulzar
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प्यार
की
जोत
से
घर
घर
है
चराग़ाँ
वर्ना
एक
भी
शम्अ
न
रौशन
हो
हवा
के
डर
से
Shakeb Jalali
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बात
करो
रूठे
यारों
से
सन्नाटों
से
डर
जाते
हैं
प्यार
अकेला
जी
लेता
है
दोस्त
अकेले
मर
जाते
हैं
Kumar Vishwas
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परिंद
क्यूँँ
मिरी
शाख़ों
से
ख़ौफ़
खाते
हैं
कि
इक
दरख़्त
हूँ
और
साया-दार
मैं
भी
हूँ
Asad Badayuni
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हुनर
से
काम
लिया
पेंट
ब्रश
नहीं
तोड़ा
बना
लिया
तेरे
जैसा
ही
कोई
रंगों
से
मुझे
ये
डर
है
कि
मिल
जाएगी
तो
रो
दूँगा
मैं
जिस
ख़ुशी
को
तरसता
रहा
हूँ
बरसों
से
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Rahul Gurjar
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नई
सुब्ह
पर
नज़र
है
मगर
आह
ये
भी
डर
है
ये
सहर
भी
रफ़्ता
रफ़्ता
कहीं
शाम
तक
न
पहुँचे
Shakeel Badayuni
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गुज़ार
देते
हैं
रातें
पहलू
में
उसके
जुगनू
को
भी
दर
का
फ़क़ीर
बना
रखा
है
ALI ZUHRI
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रूह
सारी
सर
ख़ुशी
से
छोड़ती
सारे
बदन
सोगवारी
बेवजह
सारी
यहाँ
घर
घर
चले
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Saurabh Yadav Kaalikhh
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बस
इतना
सा
ख़ुद
में
मैं
पूरा
हो
जाऊँ
थोड़ा
दरख़्त
थोड़ा
सा
दरिया
हो
जाऊँ
Saurabh Yadav Kaalikhh
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उम्र
भर
वो
दूसरों
की
ही
बनाता
था
छतें
ऐ
ख़ुदा
मज़दूर
की
दीवार
पक्की
क्यूँँ
नहीं
Saurabh Yadav Kaalikhh
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आक़िबत
तक
आदमी
में
सिर्फ़
पत्थर
रह
गया
देख
कर
हैरान
हूँ
ये
लाश
डूबी
क्यूँँ
नहीं
Saurabh Yadav Kaalikhh
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बँटे
मुल्क
मज़हब
के
ही
वास्ते
बहा
ख़ूँ
सभी
का
जो
मर
कट
गया
Saurabh Yadav Kaalikhh
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