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Meem Alif Shaz
dosti men saza ki tamannaa na kar
dosti men saza ki tamannaa na kar | दोस्ती में सज़ा की तमन्ना न कर
- Meem Alif Shaz
दोस्ती
में
सज़ा
की
तमन्ना
न
कर
मेरे
ज़ख़्मों
का
इतना
तमाशा
न
कर
मैं
अगर
गिर
गया
हूँ
बहुत
ज़ोर
से
तूने
मुझ
को
गिराया
है
दावा
न
कर
कल
मिले
थे
गले
भी
लगे
थे
सनम
सुब्ह
होते
ही
फिर
से
तक़ाज़ा
न
कर
आज
साया
है
कल
धूप
होगी
वहाँ
अपने
साए
का
ऐसा
तमाशा
न
कर
- Meem Alif Shaz
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हसीन
लड़की
से
दिल
लगाना
भी
इक
ख़ता
है
मुझे
पता
है
अगर
सज़ा
में
मिले
क़ज़ा
तो
अलग
मज़ा
है
मुझे
पता
है
Jatin shukla
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मिरे
गुनाह
की
मुझ
को
सज़ा
नहीं
देता
मिरा
ख़ुदा
कहीं
नाराज़
तो
नहीं
मुझ
से
Shahid Zaki
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यूँँ
तो
वो
शख़्स
बिलकुल
बे-गुनह
है
ज़माने
की
मगर
उस
पे
निगह
है
हमारे
दरमियाँ
जो
दूरियाँ
हैं
यक़ीनन
तीसरी
कोई
वजह
है
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Dileep Kumar
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किसी
के
साए
को
क़ैद
करने
का
एक
तरीक़ा
बता
रहा
हूँ
एक
उसके
आगे
चराग़
रख
दे,
एक
उसके
पीछे
चराग़
रख
दे
मैं
दिल
की
बातों
में
आ
गया
और
उठा
के
ले
आया
उसकी
पायल
दिमाग़
देता
रहा
सदाएँ,
चराग़
रख
दे,
चराग़
रख
दे
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Charagh Sharma
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क्या
जाने
किस
ख़ता
की
सज़ा
दी
गई
हमें
रिश्ता
हमारा
दार
पे
लटका
दिया
गया
शादी
में
सब
पसंद
का
लाया
गया
मगर
अपनी
पसंद
का
उसे
दूल्हा
नहीं
मिला
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Afzal Ali Afzal
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यूँँ
ज़िंदगी
गुज़ार
रहा
हूँ
तिरे
बग़ैर
जैसे
कोई
गुनाह
किए
जा
रहा
हूँ
मैं
Jigar Moradabadi
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मुझे
पहले
पहल
लगता
था
ज़ाती
मसअला
है
मैं
फिर
समझा
मोहब्बत
क़ायनाती
मसअला
है
परिंदे
क़ैद
हैं
तुम
चहचहाहट
चाहते
हो
तुम्हें
तो
अच्छा
ख़ासा
नफ़सयाती
मसअला
है
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Umair Najmi
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तेरी
ख़ुशबू
को
क़ैद
में
रखना
इत्रदानों
के
बस
की
बात
नहीं
Fahmi Badayuni
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आधी
आधी
रात
तक
सड़कों
के
चक्कर
काटिए
शा'इरी
भी
इक
सज़ा
है
ज़िंदगी
भर
काटिए
कोई
तो
हो
जिस
से
उस
ज़ालिम
की
बातें
कीजिए
चौदहवीं
का
चाँद
हो
तो
रात
छत
पर
काटिए
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Nisar Nasik
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वो
रातों-रात
'सिरी-कृष्ण'
को
उठाए
हुए
बला
की
क़ैद
से
'बसदेव'
का
निकल
जाना
Firaq Gorakhpuri
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सँभलते
सँभलते
सँभल
ही
न
पाए
जवानी
में
कैसे
क़दम
थे
उठाए
Meem Alif Shaz
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उस
को
झूठे
वादें
करने
की
बीमारी
है
ऐसा
लगता
है
उस
की
आदत
सरकारी
है
Meem Alif Shaz
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हर
इक
दिल
में
वीरानी
है
देखो
सब
की
आँखों
में
पानी
है
देखो
जब
कोई
मिलता
है
हँस
देते
हैं
बाद
में
ख़ुद
पे
हैरानी
है
देखो
आज
नहीं
तो
कल
वो
आ
जाएँगे
आते
ही
साँसें
जानी
है
देखो
इस
पत्थर
का
तो
हीरा
ही
बनेगा
अब
कुछ
करने
की
ठानी
है
देखो
अपने
ख़्वाबों
को
ज़िंदा
रख
के
ही
आँखों
में
रौनक
लानी
है
देखो
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Meem Alif Shaz
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मेरी
आँखों
को
रोने
का
हुनर
नहीं
आता
जिस
का
भी
कोई
ग़म
देखे
छलक
जाती
हैं
Meem Alif Shaz
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दुश्मनों
से
भी
मिला
करते
हैं
हम
परों
को
भी
सिया
करते
हैं
पैरों
में
काँटे
चुभाने
वाले
हम
मुसीबत
में
हँसा
करते
हैं
जो
प्यासे
हैं
ज़माने
से
वो
तिश्नगी
को
भी
पिया
करते
हैं
भूल
जाते
हैं
हक़ीक़त
अपनी
आसमाँ
को
जो
छुआ
करते
हैं
इश्क़
देखोगे
हमारा
कैसे
हम
तो
ख़्वाबों
में
मिला
करते
हैं
दीप
वो
कैसे
जला
पाएँगे
जो
हवाओं
से
डरा
करते
हैं
रूह
की
ख़ुशबू
को
वो
क्या
जाने
हुस्न
पे
ही
जो
मरा
करते
हैं
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Meem Alif Shaz
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