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Hasan Raqim
sard shaamen aur garmahat bharii uski nazar
sard shaamen aur garmahat bharii uski nazar | सर्द शा
- Hasan Raqim
सर्द
शा
में
और
गर्माहट
भरी
उसकी
नज़र
इसलिए
भी
उस
नज़र
से
ये
नज़र
हटती
नहीं
- Hasan Raqim
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दिलों
की
बातें
दिलों
के
अंदर
ज़रा
सी
ज़िद
से
दबी
हुई
हैं
वो
सुनना
चाहें,
ज़ुबां
से
सब
कुछ
मैं
करना
चाहूँ
नज़र
से
बतियां
ये
इश्क़
क्या
है,
ये
इश्क़
क्या
है,
ये
इश्क़
क्या
है,
ये
इश्क़
क्या
है
सुलगती
सांसें,
तरसती
आँखें,
मचलती
रूहें,
धड़कती
छतियां
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Aalok Shrivastav
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यूँँ
तो
वो
शख़्स
बिलकुल
बे-गुनह
है
ज़माने
की
मगर
उस
पे
निगह
है
हमारे
दरमियाँ
जो
दूरियाँ
हैं
यक़ीनन
तीसरी
कोई
वजह
है
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Dileep Kumar
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मैं
नज़र
से
पी
रहा
था
तो
ये
दिल
ने
बद-दुआ
दी
तिरा
हाथ
ज़िंदगी
भर
कभी
जाम
तक
न
पहुँचे
Shakeel Badayuni
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पहले
डाली
तेरे
चेहरे
पे
बहुत
देर
नज़र
ईद
का
चाँद
तो
फिर
बाद
में
देखा
मैंने
Vijendra Singh Parwaaz
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इक
तो
ये
नूर
उस
पे
मेरी
शर्म
भी
अलग
तू
सामने
रहा
तो
निगह
उठ
न
पाएगी
shaan manral
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नज़रें
हो
गड़ीं
जिनकी
वसीयत
पे
दिनो-रात
माँ-बाप
कि
'उम्रों
कि
दु'आ
खाक़
करेंगे
Asad Akbarabadi
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लग
गई
मुझको
नज़र
बेशक़
तुम्हारी
आईनों
मैं
बहुत
ख़ुश
था
किसी
इक
सिलसिले
से
उन
दिनों
Aarush Sarkaar
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साक़ी
कुछ
आज
तुझ
को
ख़बर
है
बसंत
की
हर
सू
बहार
पेश-ए-नज़र
है
बसंत
की
Ufuq Lakhnavi
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मैं
कहाँ
जाऊँ
करूँँ
किस
से
शिकायत
उस
की
हर
तरफ़
उस
के
तरफ़-दार
नज़र
आते
हैं।
Zubair Ali Tabish
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माँग
सिन्दूर
भरी
हाथ
हिनाई
करके
रूप
जोबन
का
ज़रा
और
निखर
आएगा
जिसके
होने
से
मेरी
रात
है
रौशन
रौशन
चाँद
में
आज
वही
अक्स
नज़र
आएगा
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Azhar Iqbal
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ख़ाक
दिल
को
भी
घर
करे
क्यूँँकर
कोई
आ
कर
यहाँ
मरे
क्यूँँकर
दिल
ख़ुशी
से
दिया
था
हम
ने
उसे
फिर
ग़मो
से
ये
दिल
भरे
क्यूँँकर
हम
उसे
याद
किस
तरह
आएँ
वो
हमें
याद
भी
करे
क्यूँँकर
उसके
हाथों
ने
छू
लिया
आख़िर
ज़ख़्म
रहते
ये
फिर
हरे
क्यूँँकर
मौत
हक़
है
तो
मुश्किलें
कैसी
मौत
से
आदमी
डरे
क्यूँँकर
और
भी
तो
हैं
हुस्न
वाले
यहाँ
दिल
उसी
पर
ही
जा
मरे
क्यूँँकर
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Hasan Raqim
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परों
को
खोलने
के
एक
मौक़े
की
ज़रुरत
है
फिर
उड़ने
वालों
को
ये
आसमाँ
ऊँचा
नहीं
लगता
Hasan Raqim
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तन्हाई
हो,
हिज्र
हो,
बातें
करने
को
तरसे
ये
दिल,
इश्क़
हुआ
वो
जिस
में
ये
हालात
मुसलसल
रहते
हों
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Hasan Raqim
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वो
मेरे
बाद
सभी
का
ही
हो
गया
देखो
मैं
जिसके
बाद
किसी
और
का
हुआ
ही
नहीं
Hasan Raqim
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तेरे
लिए
ये
सच
है
चाँद
तक
भी
जाएगा
कोई
अगर
वो
मैं
नहीं
भी
बन
सका
तो
कुछ
बुरा
नहीं
Hasan Raqim
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