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Hasan Raqim
KHaak dil ko bhi ghar kare kyunkar
KHaak dil ko bhi ghar kare kyunkar | ख़ाक दिल को भी घर करे क्यूँँकर
- Hasan Raqim
ख़ाक
दिल
को
भी
घर
करे
क्यूँँकर
कोई
आ
कर
यहाँ
मरे
क्यूँँकर
दिल
ख़ुशी
से
दिया
था
हम
ने
उसे
फिर
ग़मो
से
ये
दिल
भरे
क्यूँँकर
हम
उसे
याद
किस
तरह
आएँ
वो
हमें
याद
भी
करे
क्यूँँकर
उसके
हाथों
ने
छू
लिया
आख़िर
ज़ख़्म
रहते
ये
फिर
हरे
क्यूँँकर
मौत
हक़
है
तो
मुश्किलें
कैसी
मौत
से
आदमी
डरे
क्यूँँकर
और
भी
तो
हैं
हुस्न
वाले
यहाँ
दिल
उसी
पर
ही
जा
मरे
क्यूँँकर
- Hasan Raqim
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गली
में
बैठे
हैं
उसकी
नज़र
जमाए
हुए
हमारे
बस
में
फ़क़त
इंतिज़ार
करना
है
Swapnil Tiwari
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उस
की
यादों
की
काई
पर
अब
तो
ज़िंदगी-भर
मुझे
फिसलना
है
Siraj Faisal Khan
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तन्हाइयाँ
तुम्हारा
पता
पूछती
रहीं
शब-भर
तुम्हारी
याद
ने
सोने
नहीं
दिया
Unknown
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परिन्दे
होते
तो
डाली
पर
लौट
भी
जाते
हमें
न
याद
दिलाओ
कि
शाम
हो
गई
है
Rajesh Reddy
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तो
क्या
ऐसे
ही
रोना
आ
गया
था
नहीं
वो
याद
लहजा
आ
गया
था
Shadab Javed
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इस
रास्ते
में
जब
कोई
साया
न
पाएगा
ये
आख़िरी
दरख़्त
बहुत
याद
आएगा
Azhar Inayati
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ज़रूरत
सब
कराती
है
मोहब्बत
भी
इबादत
भी
नहीं
तो
कौन
बेमतलब
किसी
को
याद
करता
है
Umesh Maurya
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धूप
में
कौन
किसे
याद
किया
करता
है
पर
तिरे
शहर
में
बरसात
तो
होती
होगी
Ameer Imam
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कितने
नादाँ
हैं
तेरे
भूलने
वाले
कि
तुझे
याद
करने
के
लिए
उम्र
पड़ी
हो
जैसे
Ahmad Faraz
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अब
बिछड़ने
पर
समझ
पाते
हैं
हम
इक
दूसरे
को
इम्तिहाँ
के
ख़त्म
हो
जाने
पे
हल
याद
आ
रहा
है
Nishant Singh
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रौज़न-ए-हम
नज़र
पे
दस्तक
दे
ख़्वाहिशातों
के
दर
पे
दस्तक
दे
तन्हा
शा
में
ये
सोचते
गुज़रीं
कोई
तो
आए
घर
पे
दस्तक
दे
कब
तक
उसकी
गली
से
गुज़रेगा
जा
कभी
उसके
दर
पे
दस्तक
दे
काम-काजों
से
घिर
चुका
कोई
कैसे
अपने
हुनर
पे
दस्तक
दे
उसका
होना
है
इस
सेे
पहले
की,
मौत
आकर
के
दर
पे
दस्तक
दे
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Hasan Raqim
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मैं
आज
तुम
सेे
आख़िरी
दफ़ा
मिला
तो
ये
लगा
बहुत
ग़लत
था
तुम
सेे
दूरियाँ
बढ़ाने
वाला
मैं
Hasan Raqim
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मुसीबतों
में
तो
याद
करते
ही
हैं
किसी
को
ये
लोग
सारे
मगर
कभी
जो
सुकूँ
में
आए
ख़याल
मेरा
तो
लौट
आना
Hasan Raqim
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इतना
मुश्किल
है
हर
इक
शख़्स
को
प्यारा
होना
जैसे
तूफा़न
का
कश्ती
को
सहारा
होना
मेरी
दुनिया
ये
अधूरी
है
अधूरी
न
रहे
तू
मेरा
जब
भी
कभी
होना
तो
सारा
होना
दिल
की
मन्नत
को
लबों
पर
भी
तेरे
लाने
को
इतना
मुश्किल
भी
नहीं
टूटता
तारा
होना
सारी
दुनिया
पे
मेरी
जीत
से
भी
बढ़कर
है
इश्क़
में
मेरा
उस
इक
शख़्स
से
हारा
होना
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Hasan Raqim
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कुछ
कहा
और
कुछ
अनकहा
रह
गया
दिल
युँही
ख़्वाहिशों
से
भरा
रह
गया
उसने
जाते
हुए
ये
भी
सोचा
नहीं
उसके
जाने
पे,
बाक़ी
ही
क्या
रह
गया
उम्र
भर
साथ
देना
था
मेरा
जिसे
वो
गया
और
मैं
देखता
रह
गया
दश्त
में
जिसको
दरिया
समझते
हो
तुम
पास
उसके
है
जो
भी
गया,
रह
गया
इश्क़
से
और
उम्मीद
होती
भी
क्या
इश्क़
में
जो
फ़ना
था
फ़ना
रह
गया
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Hasan Raqim
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