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Hasan Raqim
itnaa mushkil hai har ik shaKHs ko pyaara hona
itnaa mushkil hai har ik shaKHs ko pyaara hona | इतना मुश्किल है हर इक शख़्स को प्यारा होना
- Hasan Raqim
इतना
मुश्किल
है
हर
इक
शख़्स
को
प्यारा
होना
जैसे
तूफा़न
का
कश्ती
को
सहारा
होना
मेरी
दुनिया
ये
अधूरी
है
अधूरी
न
रहे
तू
मेरा
जब
भी
कभी
होना
तो
सारा
होना
दिल
की
मन्नत
को
लबों
पर
भी
तेरे
लाने
को
इतना
मुश्किल
भी
नहीं
टूटता
तारा
होना
सारी
दुनिया
पे
मेरी
जीत
से
भी
बढ़कर
है
इश्क़
में
मेरा
उस
इक
शख़्स
से
हारा
होना
- Hasan Raqim
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मेरा
अरमान
मेरी
ख़्वाहिश
नहीं
है
ये
दुनिया
मेरी
फ़रमाइश
नहीं
है
मैं
तेरे
ख़्वाब
वापस
कर
रहा
हूँ
मेरी
आँखों
में
गुंजाइश
नहीं
है
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Abrar Kashif
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बन
कर
कसक
चुभती
रही
दिल
में
मिरे
इक
आह
थी
ऐ
हम–नफ़स
मेरे
मुझे
तुझ
सेे
वफ़ा
की
चाह
थी
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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हमें
इस
मिट्टी
से
कुछ
यूँँ
मुहब्बत
है
यहीं
पे
निकले
दम
दिल
की
ये
हसरत
है
हमें
क्यूँ
चाह
उस
दुनिया
की
हो
मौला
हमारी
तो
इसी
मिट्टी
में
जन्नत
है
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Harsh saxena
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ज़रा
पाने
की
चाहत
में
बहुत
कुछ
छूट
जाता
है
नदी
का
साथ
देता
हूँ
समुंदर
रूठ
जाता
है
Aalok Shrivastav
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हज़ारों
ख़्वाहिशें
ऐसी
कि
हर
ख़्वाहिश
पे
दम
निकले
बहुत
निकले
मिरे
अरमान
लेकिन
फिर
भी
कम
निकले
Mirza Ghalib
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मिरी
आरज़ू
का
हासिल
तिरे
लब
की
मुस्कुराहट
हैं
क़ुबूल
मुझ
को
सब
ग़म
तिरी
इक
ख़ुशी
के
बदले
Kashif Adeeb Makanpuri
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भटकती
रूहों
का
बोझ
कब
तक
कोई
उठाता
कहीं
ठहरता,पनाह
लेता,
तो
साथ
होता
मैं
जिस
'अक़ीदत
के
साथ
उसको
भुला
रहा
हूँ
उसी
'अक़ीदत
से
चाह
लेता,
तो
साथ
होता
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Armaan khan
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नाज़-ओ-नख़रे
क्या
उठाए,
क्या
सुने
उस
के
गिले
देखते
ही
देखते
लड़की
घमंडी
हो
गई
देखते
रहने
में
उस
को
और
क्या
होता,
मगर
जो
थी
जान-ए-आरज़ू,
वो
चाय
ठंडी
हो
गई
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Kazim Rizvi
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'असद'
ये
शर्त
नहीं
है
कोई
मुहब्बत
में
कि
जिस
सेे
प्यार
करो
उसकी
आरज़ू
भी
करो
Subhan Asad
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ज़ख़्म
उनके
लिए
मेहमान
हुआ
करते
हैं
मुफ़लिसी
जो
तेरे
दरबान
हुआ
करते
हैं
वो
अमीरों
के
लिए
आम
सी
बातें
होंगी
हम
ग़रीबों
के
जो
अरमान
हुआ
करते
हैं
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Mujtaba Shahroz
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याद
आता
है
मुझे,
उसका
फसाना
भी
बहुत
और
मुश्किल
है
उसे
दिल
से
मिटाना
भी
बहुत
मुझको
ख़्वाबों
में
फ़क़त
आता
है
तू
ही
तू
नज़र
और
होता
है
तेरी
यादों
का
आना
भी
बहुत
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Hasan Raqim
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दिल
में
मेरे
अभी
बाक़ी
ये
ख़ला
रहने
दो
ज़ख़्म
मुझको
है
बहुत
बाद
मिला,
रहने
दो
मेरे
आँगन
के
चिराग़ो
को
बुझा
दो,
लेकिन
उसके
आँगन
के
चिराग़ो
को
जला
रहने
दो
उसकी
मर्ज़ी
है
वो
घर
आए,
नहीं
आए
मगर
तुम,
ये
बेहतर
है
की
दरवाज़ा
खुला
रहने
दो
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Hasan Raqim
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जीने
भी
नहीं
देता
मरने
भी
नहीं
देता
न
प्यार
करे
है
ख़ुद
करने
भी
नहीं
देता
Hasan Raqim
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सोज़-ए-वफ़ा
के
नाम
से
अरमान
थे
बहुत
लेकिन
दयार
-ए-इश्क़
से
अंजान
थे
बहुत
लगता
था
उन्हें
इश्क़
की
राहें
हैं
मुनाकिद
आकर
के
राह-ए-इश्क़
में
हैरान
थे
बहुत
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Hasan Raqim
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चल
रहें
हैं
मगर
कोई
मंज़िल
नहीं
दिल
ये
घर
लौटने
पे
भी
माइल
नहीं
इन
चराग़ों
की
कोशिश
उजाले
की
है
यूँँ
तो
सूरज
का
कोई
मुक़ाबिल
नहीं
ग़म
ये
है
उसको
अपना
समझता
था
मैं
और
वो
ही
मेरे
ग़म
में
शामिल
नहीं
उसको
पाने
में
भी
मुश्किलें
हैं
बहुत
इश्क़
होना
ही
बस
एक
मुश्किल
नहीं
तुम
नहीं
तो
कोई
और
होगा
मेरा
इस
समुंदर
का
बस
एक
साहिल
नहीं
ज़िंदगी
में
सब
ही
कुछ
मिला
है
मगर
एक
वो
शख़्सही
मुझको
हासिल
नहीं
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Hasan Raqim
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