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Hasan Raqim
chal rahen hain magar koi manzil nahin
chal rahen hain magar koi manzil nahin | चल रहें हैं मगर कोई मंज़िल नहीं
- Hasan Raqim
चल
रहें
हैं
मगर
कोई
मंज़िल
नहीं
दिल
ये
घर
लौटने
पे
भी
माइल
नहीं
इन
चराग़ों
की
कोशिश
उजाले
की
है
यूँँ
तो
सूरज
का
कोई
मुक़ाबिल
नहीं
ग़म
ये
है
उसको
अपना
समझता
था
मैं
और
वो
ही
मेरे
ग़म
में
शामिल
नहीं
उसको
पाने
में
भी
मुश्किलें
हैं
बहुत
इश्क़
होना
ही
बस
एक
मुश्किल
नहीं
तुम
नहीं
तो
कोई
और
होगा
मेरा
इस
समुंदर
का
बस
एक
साहिल
नहीं
ज़िंदगी
में
सब
ही
कुछ
मिला
है
मगर
एक
वो
शख़्सही
मुझको
हासिल
नहीं
- Hasan Raqim
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ग़म-ए-ज़माना
ने
मजबूर
कर
दिया
वर्ना
ये
आरज़ू
थी
कि
बस
तेरी
आरज़ू
करते
Akhtar Shirani
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तू
है
सूरज
तुझे
मालूम
कहाँ
रात
का
दुख
तू
किसी
रोज़
मेरे
घर
में
उतर
शाम
के
बाद
Farhat Abbas Shah
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आन
के
इस
बीमार
को
देखे
तुझको
भी
तौफ़ीक़
हुई
लब
पर
उसके
नाम
था
तेरा
जब
भी
दर्द
शदीद
हुआ
Ibn E Insha
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ये
ग़म
हमको
पत्थर
कर
देगा
इक
दिन
कोई
आ
कर
हमें
रुलाओ
पहले
तो
Siddharth Saaz
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दर्द
सहने
का
अलग
अंदाज़
है
जी
रहे
हैं
हम
अदा
की
ज़िंदगी
Farhat Abbas Shah
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वफ़ा
तुम
से
करेंगे
दुख
सहेंगे
नाज़
उठाएँगे
जिसे
आता
है
दिल
देना
उसे
हर
काम
आता
है
Arzoo Lakhnavi
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दुनिया
ने
तेरी
याद
से
बेगाना
कर
दिया
तुझ
से
भी
दिल-फ़रेब
हैं
ग़म
रोज़गार
के
Faiz Ahmad Faiz
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वो
रातें
चाँद
के
साथ
गईं
वो
बातें
चाँद
के
साथ
गईं
अब
सुख
के
सपने
क्या
देखें
जब
दुख
का
सूरज
सर
पर
हो
Ibn E Insha
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ज़रा
सा
ग़म
हुआ
और
रो
दिए
हम
बड़ी
नाज़ुक
तबीअत
हो
गई
है
Shahzad Ahmad
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ज़िंदगी
क्या
किसी
मुफ़लिस
की
क़बा
है
जिस
में
हर
घड़ी
दर्द
के
पैवंद
लगे
जाते
हैं
Faiz Ahmad Faiz
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ये
मत
सोचो
यार
सफ़र
बस
मंज़िल
तक
ही
सीमित
है
मैंने
उसके
आगे
भी
राहों
का
जाना
देखा
है
Hasan Raqim
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अगर
दिए
सा
भी
कम
होता
ज़िंदगी
का
वक़्त
गुज़ार
देता
तेरे
साथ
में
वो
सारा
वक़्त
वो
बात
करती
थी
जब
उसको
वक़्त
मिलता
था,
मैं
बात
करने
की
ख़ातिर
निकालता
था
वक़्त
उसे
ख़बर
भी
नहीं
थी
मगर
ये
ग़म
था
मुझे,
उसे
हँसाता
था
मुझ
को
रुलाने
वाला
वक़्त
किसी
दिए
सा
ही
रोशन
हुआ
था
वक़्त
अपना
किसी
दिए
की
तरह
ही
ये
जा
बुझेगा
वक़्त
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Hasan Raqim
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पहले
रूठा
यार
मनाना
होता
है
फिर
कोई
त्यौहार
मनाना
होता
है
उसका
क्या
है
वो
तो
बस
रो
देता
है
मुझको
ही
हर
बार
मनाना
होता
है
रिश्तों
की
बुनियाद
बसीरत
होती
है
इस
ख़ातिर
संसार
मनाना
होता
है
मैं
वो
हूँ
जो
हारा
उसकी
ख़ुशियों
से
मुझको
ग़म
भी
यार
मनाना
होता
है
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Hasan Raqim
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परों
को
खोलने
के
एक
मौक़े
की
ज़रुरत
है
फिर
उड़ने
वालों
को
ये
आसमाँ
ऊँचा
नहीं
लगता
Hasan Raqim
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इश्क़
मोहब्बत
प्यार
वगेहरा
ये
जो
दिल
की
बातें
हैं
सच
पूछो
तो
सहरा
में
दरिया
मिलने
सी
बातें
हैं
मैं
उसको
ये
समझाते
थक
जाता
हूँ
की
जान
सुनो
ख़त
लिखना
और
फूल
भेजना
कहने
वाली
बातें
हैं
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Hasan Raqim
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