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Dileep Kumar
beta zaraa sa jo kamaane lag gaya
beta zaraa sa jo kamaane lag gaya | बेटा ज़रा सा जो कमाने लग गया
- Dileep Kumar
बेटा
ज़रा
सा
जो
कमाने
लग
गया
फिर
बाप
से
दूरी
बनाने
लग
गया
- Dileep Kumar
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सब
को
बचाओ
ख़ुद
भी
बचो
फ़ासला
रखो
अब
और
कुछ
करो
न
करो
फ़ासला
रखो
ख़तरा
तो
मुफ़्त
में
भी
नहीं
लेना
चाहिए
घर
से
निकल
के
मोल
न
लो
फ़ासला
रखो
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Jawwad Sheikh
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कैसी
बिपता
पाल
रखी
है
क़ुर्बत
की
और
दूरी
की
ख़ुशबू
मार
रही
है
मुझ
को
अपनी
ही
कस्तूरी
की
Naeem Sarmad
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शब-ए-विसाल
बहुत
कम
है
आसमाँ
से
कहो
कि
जोड़
दे
कोई
टुकड़ा
शब-ए-जुदाई
का
Ameer Minai
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फ़ासला
रख
कर
भी
क्या
हासिल
हुआ
आज
भी
उसका
ही
कहलाता
हूँ
मैं
Shariq Kaifi
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नज़दीकी
अक्सर
दूरी
का
कारन
भी
बन
जाती
है
सोच-समझ
कर
घुलना-मिलना
अपने
रिश्ते-दारों
में
Aalok Shrivastav
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उस
मेहरबाँ
नज़र
की
इनायत
का
शुक्रिया
तोहफ़ा
दिया
है
ईद
पे
हम
को
जुदाई
का
Unknown
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जो
देखने
में
बहुत
ही
क़रीब
लगता
है
उसी
के
बारे
में
सोचो
तो
फ़ासला
निकले
Waseem Barelvi
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बड़े
लोगों
से
मिलने
में
हमेशा
फ़ासला
रखना
जहाँ
दरिया
समुंदर
से
मिला
दरिया
नहीं
रहता
Bashir Badr
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मंज़िलें
क्या
हैं,
रास्ता
क्या
है
हौसला
हो
तो
फ़ासला
क्या
है
Aalok Shrivastav
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जाड़ों
की
रातें
उस
पर
भी
तुम
सेे
ये
जुदाई
बाहों
की
छोड़ो
हमको
हासिल
नहीं
रजाई
Harsh saxena
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ग़ुरूर
भी
बहुत
हैं
और
दिलकशी
नहीं
रही
तिरे
बिना
ये
ज़िंदगी
भी
ज़िंदगी
नहीं
रही
मिलें
हैं
आज
तीन-चार
साल
बाद
हम
कहीं
मगर
लबों
पे
उस
के
वो
शिकस्तगी
नहीं
रही
सभी
ही
तोड़ते
रहे
किसी
तरह
से
दिल
मिरा
मगर
मिरी
किसी
से
बे-त'अल्लुक़ी
नहीं
रही
ये
एक
शख़्स
का
मलाल
सीख
दे
गया
मुझे
जहाँ
में
अब
'दिलीप'
आदमी-गरी
नहीं
रही
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Dileep Kumar
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और
तो
न
देंगे
कोई
दलील
जान-ए-मन
ये
मु'आमला
भी
हम
छोड़ते
हैं
अब
तुम
पर
Dileep Kumar
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क़तरा
क़तरा
मुझ
में
बेदारी
है
ग़म
से
भी
लेकिन
रिश्तेदारी
है
ये
दुनिया
जो
अब
इतनी
बदतर
है
इस
में
हम
सब
की
हिस्से-दारी
है
घर
के
मसअले
सुलझाने
की
कुछ
कुछ
मेरी
कुछ
तेरी
ज़िम्मेदारी
है
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Dileep Kumar
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साल-ए-नौ
का
जश्न
मुबारक
तुमको
हम
तो
रोएँगे
अपना
दुख
लेकर
Dileep Kumar
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जब
जब
ये
दिल
बंजर
कम
लगता
है
मुझको
अपना
ही
घर
कम
लगता
है
जब
से
मैं
ने
तेरी
आँखें
देखी
मुझको
तेरा
पैकर
कम
लगता
है
हर
इक
को
रस्ता
समझाने
वाले
तू
सब
को
ही
रहबर
कम
लगता
है
मुख़्बर
का
इक
ये
भी
फ़न
होता
है
मुख़्बर
सबको
मुख़्बर
कम
लगता
है
अपने
अफ़साने
शाबाशी
लूटे
हम-सर
का
हर
मंज़र
कम
लगता
है
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Dileep Kumar
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