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Dileep Kumar
tumko to bas ye dikhaana hota hai
tumko to bas ye dikhaana hota hai | तुमको तो बस ये दिखाना होता है
- Dileep Kumar
तुमको
तो
बस
ये
दिखाना
होता
है
हमको
रिश्ता
भी
निभाना
होता
है
जिस
तक़ल्लुफ़
से
तू
मुझ
सेे
मिलता
है
वो
फ़क़त
मिलना-मिलाना
होता
है
ज़िंदगी
ख़ुद
नाचने
लग
जाती
है
हमको
बस
इक
गीत
गाना
होता
है
मिलने
की
तय्यारी
करनी
पड़ती
है
और
ख़ुद
को
भी
मनाना
होता
है
तुमको
तो
महफ़िल
सजानी
होती
है
हमको
वापस
घर
भी
जाना
होता
है
- Dileep Kumar
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बहुत
कुछ
बोलना
है
पर
अभी
ख़ामोश
रहने
दो
ख़मोशी
बोलती
है
तो,
बड़ी
आवाज़
करती
है
Divy Kamaldhwaj
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शब-ए-हिज्रां
बुझा
बैठी
हूँ
मैं
सारे
सितारे
पर
कोई
फ़ानूस
रौशन
है
ख़मोशी
से
मेरे
अंदर
Kiran K
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ग़लत
बातों
को
ख़ामोशी
से
सुनना
हामी
भर
लेना
बहुत
हैं
फ़ाएदे
इस
में
मगर
अच्छा
नहीं
लगता
Javed Akhtar
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बस
ये
हुआ
कि
उस
ने
तकल्लुफ़
से
बात
की
और
हम
ने
रोते
रोते
दुपट्टे
भिगो
लिए
Parveen Shakir
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वहाँ
पहले
ही
आवाज़ें
बहुत
थीं
सो
मैं
ने
चुप
कराया
ख़ामुशी
को
Abhishek shukla
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हम
लबों
से
कह
न
पाए
उन
से
हाल-ए-दिल
कभी
और
वो
समझे
नहीं
ये
ख़ामुशी
क्या
चीज़
है
Nida Fazli
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मेरे
मिज़ाज
की
उसको
ख़बर
नहीं
रही
है
ये
बात
मेरे
गले
से
उतर
नहीं
रही
है
ये
रोने-धोने
का
नाटक
तवील
मत
कर
अब
बिछड़
भी
जाए
तू
मुझ
सेे
तो
मर
नहीं
रही
है
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Ashutosh Vdyarthi
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मेरे
होंटों
पे
ख़ामुशी
है
बहुत
इन
गुलाबों
पे
तितलियाँ
रख
दे
Shakeel Azmi
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उसे
बेचैन
कर
जाऊँगा
मैं
भी
ख़मोशी
से
गुज़र
जाऊँगा
मैं
भी
Ameer Qazalbash
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ख़ामोशी
वो
भी
इतनी
मेरे
उसके
दरमियाँ
इस
दिल
के
टूटने
की
सदा
आ
गई
उसे
NISHKARSH AGGARWAL
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ज़ेहन
में
पिंदार
ही
पिंदार
है
पर
अकेले
चलना
भी
दुश्वार
है
और
कोई
मसअला
भी
अब
नहीं
दरमियाँ
बस
एक
ही
दीवार
है
चाय
क्या
पीते
ख़बर
क्या
पढ़ते
हम
ख़ून
से
लथपथ
जो
ये
अख़बार
है
जीत
से
पहले
अलग
हैं,
बाद
में
नेता
लोगों
के
अलग
किरदार
है
हम
करें
शिकवा
भी
तो
किस
से
करें
जब
हमारे
दोस्त
ही
दो-चार
है
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Dileep Kumar
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हमारी
रातें
भी
उजड़ी
हुई
सी
हैं
चराग़ों
से
हमें
भी
थोड़ी
नफ़रत
हैं
Dileep Kumar
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सब
छोड़
जाएँगे
मकाँ
रह
जाएँगे
कुछ
ज़ख़्मों
के
दिल
पे
निशाँ
रह
जाएँगे
जिन
पे
ज़ियादा
ही
भरोसा
है
अभी
वो
लोग
भी
कल
बद-गुमाँ
रह
जाएँगे
ये
जिस
तरह
से
सिर्फ़
सुनते
रहते
हैं
सारे
शजर
ही
राज़-दाँ
रह
जाएँगे
जैसा
कहानी
में
मिरा
किरदार
है
हम
इम्तिहाँ
के
दरमियाँ
रह
जाएँगे
तुझ
सेे
नहीं
है
मुनहसिर
ज़िंदा-दिली
जब
तक
चमन
हैं
बाग़बाँ
रह
जाएँगे
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Dileep Kumar
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इक
आदमी
भी
जब
नहीं
राज़ी
लतीफ़ों
के
लिए
फिर
तो
बचा
ही
कुछ
नहीं
हैं
हम
दरख़्तों
के
लिए
जो
ज़हर
फैलाने
लगी
है
हर
तरफ़
से
हर
कहीं
कोई
दवा
है
तो
बताओ
उन
हवाओं
के
लिए
किस
बात
पर
तुम
ने
भरोसा
कर
लिया
उस
शख़्स
का
मशहूर
है
जो
शहर
भर
में
बस
फ़सानों
के
लिए
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Dileep Kumar
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अपना
ही
एक
मौसम
लिए
फिरते
हैं
लोग
जो
दिल
को
पुर-ग़म
लिए
फिरते
हैं
चारा-गर
जैसे
हैं
ये
सुख़न-वर
सभी
सबके
ज़ख़्मों
का
मरहम
लिए
फिरते
हैं
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Dileep Kumar
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