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Dileep Kumar
apna hi ek mausam li.e firte hain
apna hi ek mausam li.e firte hain | अपना ही एक मौसम लिए फिरते हैं
- Dileep Kumar
अपना
ही
एक
मौसम
लिए
फिरते
हैं
लोग
जो
दिल
को
पुर-ग़म
लिए
फिरते
हैं
चारा-गर
जैसे
हैं
ये
सुख़न-वर
सभी
सबके
ज़ख़्मों
का
मरहम
लिए
फिरते
हैं
- Dileep Kumar
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बीच
भँवर
से
कश्ती
कैसे
बच
निकली
बहुत
दिनों
तक
दरिया
भी
हैरान
रहा
Madan Mohan Danish
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मिरे
माँ
बाप
जन्नत
से
नज़र
रखते
हैं
मुझ
पर
अब
मिरे
दिल
में
यतीमों
के
लिए
इक
ख़ास
कोना
है
Amaan Pathan
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तुम्हारे
पाँव
क़सम
से
बहुत
ही
प्यारे
हैं
ख़ुदा
करे
मेरे
बच्चों
की
इन
में
जन्नत
हो
Rafi Raza
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लब-ए-दरिया
पे
देख
आ
कर
तमाशा
आज
होली
का
भँवर
काले
के
दफ़
बाजे
है
मौज
ऐ
यार
पानी
में
Shah Naseer
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ग़ुंचा
ओ
गुल
माह
ओ
अंजुम
सब
के
सब
बेकार
थे
आप
क्या
आए
कि
फिर
मौसम
सुहाना
आ
गया
Asad Bhopali
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रात
के
जिस्म
में
जब
पहला
पियाला
उतरा
दूर
दरिया
में
मेरे
चाँद
का
हाला
उतरा
Kumar Vishwas
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मैं
आख़िर
कौन
सा
मौसम
तुम्हारे
नाम
कर
देता
यहाँ
हर
एक
मौसम
को
गुज़र
जाने
की
जल्दी
थी
Rahat Indori
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एक
दरिया
है
यहाँ
पर
दूर
तक
फैला
हुआ
आज
अपने
बाजुओं
को
देख
पतवारें
न
देख
Dushyant Kumar
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ख़ुद
बुलाओ
के
वो
यूँँ
घर
से
नहीं
निकलेगा
यहाँ
इनाम
मुक़द्दर
से
नहीं
निकलेगा
ऐसे
मौसम
में
बिना
काम
के
आया
हुआ
शख़्स
इतनी
जल्दी
तेरे
दफ़्तर
से
नहीं
निकलेगा
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Khurram Afaq
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करती
है
तो
करने
दे
हवाओं
को
शरारत
मौसम
का
तकाज़ा
है
कि
बालों
को
खुला
छोड़
Abrar Kashif
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एक
रिश्ता
सब
निभाए
जा
रहे
हैं
झूठ
के
आँसू
बहाए
जा
रहे
हैं
कुछ
परिंदे
जो
सताए
जा
रहे
हैं
ये
सितारे
हैं
मिटाए
जा
रहे
हैं
यूँँ
अचानक
मिल
गया
है
वो
कि
हम
तो
बे-वजह
ही
मुस्कुराए
जा
रहे
हैं
बात
उस
सेे
जो
नहीं
हो
पाई
है
तो
इक
ग़ज़ल
हम
गुनगुनाए
जा
रहे
हैं
इश्क़
का
इज़हार
करने
आया
है
वो
और
हम
बातें
बनाए
जा
रहे
हैं
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Dileep Kumar
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तू
कभी
मुझ
सेे
मिला
तस्वीर
मेरी
देख
फिर
कोई
जुदा
तस्वीर
मेरी
इक
बनानी
थी
उसे
ग़मगीन
सूरत
वो
बनाता
ही
गया
तस्वीर
मेरी
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Dileep Kumar
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ख़ुद
ही
अपनी
हौसला-अफ़ज़ाई
की
इतनी
आदत
पड़
गई
तन्हाई
की
शाने
पे
सर
रख
के
रोई
किसके
तुम
कौन
था
जिसने
मिरी
भरपाई
की
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Dileep Kumar
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खौफ़
है
कोई
जो
दिल
से
जाता
नहीं
इसलिए
मैं
तुझे
आज़माता
नहीं
उसके
लहजे
से
ही
मैं
समझ
जाता
हूँ
वो
तो
नाराज़गी
भी
जताता
नहीं
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Dileep Kumar
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हिज्र
में
जो
सहारा
हुआ
फिर
उसी
से
किनारा
हुआ
आ
न
पाए
तिरे
शहर
तो
पर
वहीं
पे
गुज़ारा
हुआ
जब
किसी
की
नज़र
थी
नहीं
तब
जरा
सा
इशारा
हुआ
हैं
हज़ारों
दिवाने
तिरे
और
तू
कब
हमारा
हुआ
अब
किसी
की
ज़रूरत
नहीं
देख
कितना
ख़सारा
हुआ
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Dileep Kumar
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