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Dileep Kumar
tire dil men kabhi nafrat nahin aayi
tire dil men kabhi nafrat nahin aayi | तिरे दिल में कभी नफ़रत नहीं आई
- Dileep Kumar
तिरे
दिल
में
कभी
नफ़रत
नहीं
आई
हमें
भी
हिज्र
में
राहत
नहीं
आई
मुनासिब
था
तिरा
मुझ
सेे
बिछड़
जाना
मुझे
भी
रास
ये
सोहबत
नहीं
आई
जफ़ा-कश
दूसरों
के
घर
बनाते
हम
मुक़द्दर
में
हमारे
छत
नहीं
आई
किसी
भी
तौर
मैं
उसको
मनाता
पर
मिरे
हिस्से
कभी
ज़हमत
नहीं
आई
बड़ा
वीराँ
लगा
वो
घर
कि
जिस
घर
में
कभी
कोई
जहाँ
औरत
नहीं
आई
- Dileep Kumar
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हम
भी
दरिया
हैं
हमें
अपना
हुनर
मालूम
है
जिस
तरफ़
भी
चल
पड़ेंगे
रास्ता
हो
जाएगा
Bashir Badr
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जहाँ
पहुँच
के
क़दम
डगमगाए
हैं
सब
के
उसी
मक़ाम
से
अब
अपना
रास्ता
होगा
Aabid Adeeb
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भूल
जोते
हैं
मुसाफ़िर
रस्ता
लोग
कहते
हैं
कहानी
फिर
भी
Ambreen Haseeb Ambar
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मैं
किस
से
पूछूँ
ये
रस्ता
दुरुस्त
है
कि
ग़लत
जहाँ
से
कोई
गुज़रता
नहीं
वहाँ
हूँ
मैं
Umair Najmi
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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दिल
के
तमाम
ज़ख़्म
तेरी
हाँ
से
भर
गए
जितने
कठिन
थे
रास्ते
वो
सब
गुज़र
गए
Kumar Vishwas
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मक़ाम
'फ़ैज़'
कोई
राह
में
जचा
ही
नहीं
जो
कू-ए-यार
से
निकले
तो
सू-ए-दार
चले
Faiz Ahmad Faiz
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चलते
हुए
मुझ
में
कहीं
ठहरा
हुआ
तू
है
रस्ता
नहीं
मंज़िल
नहीं
अच्छा
हुआ
तू
है
Abhishek shukla
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हम
जान
से
जाएँगे
तभी
बात
बनेगी
तुम
से
तो
कोई
राह
निकाली
नहीं
जाती
Wasi Shah
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कभी
किसी
न
किसी
राह
पर
मिलेंगे
फिर
हम
एक
से
ही
ख़यालात
पेश
करते
हुए
shaan manral
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हमारे
इश्क़
की
इतनी
सी
क़ीमत
है
जहाँ
भर
की,
हमारे
साथ
ज़िल्लत
है
खड़े
हैं
दूर
तुझ
सेे
तेरी
महफ़िल
में
ख़ुदा
की
देख
हम
पे
कितनी
रहमत
है
हमारी
रातें
भी
उजड़ी
हुई
सी
है
चराग़ों
से
हमें
भी
थोड़ी
नफ़रत
है
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Dileep Kumar
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अजब
सा
मोड़
आया
है
कहानी
में
लगायी
है
किसी
ने
आग
पानी
में
सदाक़त
की
तरफ़दारी
ज़रूरी
है
मगर
यूँँ
फ़ाइदा
है
कम-ज़बानी
में
उड़ाई
मौज
हमने
आसमानों
पर
खिलाए
गुल
कई
हमने
जवानी
में
तिरे
जैसा
न
कोई
हम
सेफ़र
हो
तो
सफ़र
ये
ख़त्म
होगा
राइगानी
में
किसी
से
भी
नहीं
जब
बात
बन
पाई
बिता
दी
उम्र
हमने
ख़ुद-ग़ुमानी
में
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Dileep Kumar
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काश!
तुम
पहले
मुकम्मल
बात
करते
और
फिर
मुझ
सेे
मुसलसल
बात
करते
Dileep Kumar
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हिज्र
में
जो
सहारा
हुआ
फिर
उसी
से
किनारा
हुआ
आ
न
पाए
तिरे
शहर
तो
पर
वहीं
पे
गुज़ारा
हुआ
जब
किसी
की
नज़र
थी
नहीं
तब
जरा
सा
इशारा
हुआ
हैं
हज़ारों
दिवाने
तिरे
और
तू
कब
हमारा
हुआ
अब
किसी
की
ज़रूरत
नहीं
देख
कितना
ख़सारा
हुआ
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Dileep Kumar
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दरमियाँ
जब
किसी
को
गवारा
किया
हमने
हर
एक
से
फिर
किनारा
किया
हमने
तो
सोची
थी
ज़िंदगी
साथ
में
पर
किसी
और
से
ही
गुज़ारा
किया
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Dileep Kumar
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