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Dileep Kumar
sabse use mohtaath karta rehta hooñ
sabse use mohtaath karta rehta hooñ | सब सेे उसे मोहतात करता रहता हूँ
- Dileep Kumar
सब
सेे
उसे
मोहतात
करता
रहता
हूँ
ज़ाया''
मिरे
जज़्बात
करता
रहता
हूँ
किस
हाल
में,
कैसी,
कहाँ
होगी
वो
अब
ये
फ़िक्र
मैं
दिन-रात
करता
रहता
हूँ
कोई
वजह
है
ही
नहीं
दिलबर,
तुझे
मैं
याद
ही
बे-बात
करता
रहता
हूँ
- Dileep Kumar
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हमारे
दिल
में
तुम
गहरे
न
उतरो
किसी
की
याद
का
गोदाम
होगा
Tanoj Dadhich
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वर्षों
की
सब
याद
सजा
के
रक्खी
है
घर
में
बस
सामान
नहीं
है,
समझा
कर
Shivam Tiwari
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आप
की
याद
आती
रही
रात
भर
चश्म-ए-नम
मुस्कुराती
रही
रात
भर
Makhdoom Mohiuddin
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ज़रा
देर
बैठे
थे
तन्हाई
में
तिरी
याद
आँखें
दुखाने
लगी
Adil Mansuri
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ईद
ख़ुशियों
का
दिन
सही
लेकिन
इक
उदासी
भी
साथ
लाती
है
ज़ख़्म
उभरते
हैं
जाने
कब
कब
के
जाने
किस
किस
की
याद
आती
है
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Farhat Ehsaas
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ये
शहर-ए-अजनबी
में
अब
किसे
जा
कर
बताएँ
हम
कहाँ
के
रहने
वाले
हैं
कहाँ
की
याद
आती
है
Ashu Mishra
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मैं
रहा
उम्र
भर
जुदा
ख़ुद
से
याद
मैं
ख़ुद
को
उम्र
भर
आया
Jaun Elia
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ग़ुर्बत
की
ठंडी
छाँव
में
याद
आई
उस
की
धूप
क़द्र-ए-वतन
हुई
हमें
तर्क-ए-वतन
के
बाद
Kaifi Azmi
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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कैसे
किसी
की
याद
हमें
ज़िंदा
रखती
है
एक
ख़याल
सहारा
कैसे
हो
सकता
है
Jawwad Sheikh
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रोज़
थोड़ा
बहुत
ग़म
कमाते
रहे
फिर
उसी
को
कमाई
बताते
रहे
इश्क़
करते
रहे
उम्र
भर
और
फिर
उम्र
भर
इश्क़
से
खौफ़
खाते
रहे
और
कुछ
साफ़
किरदार
के
लोग
ही
देश
में
बस्तियों
को
जलाते
रहे
होश
में
आ
न
जाऊँ
कहीं
इस
लिए
जाम
पे
जाम
मुझ
को
पिलाते
रहे
जाननी
थी
सभी
को
कहानी
मिरी
हम
मगर
इक
फ़साना
सुनाते
रहे
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Dileep Kumar
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क्या
सितम
है
तुम
पे
ग़ज़लें
लिख
रहें
हैं
हमको
ये
दुख
तो
कभी
लिखना
नहीं
था
Dileep Kumar
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मुझको
वो
इतना
बे-ज़ार
कर
देता
है
मेरा
जीना
भी
दुश्वार
कर
देता
है
जिस
तरह
हँस
के
मिलता
है
हर
एक
से
मुझको
भी
वो
मिलन-सार
कर
देता
है
वो
जो
मुमकिन
नहीं
है
कहानी
से
भी
काम
वो
एक
किरदार
कर
देता
है
घर
हो
जाते
हैं
मिसमार
इस
से
मगर
इक
ग़लत
दाँव
बेदार
कर
देता
है
इश्क़
कुछ
भी
नहीं
इक
मरज़
के
सिवा
अच्छे
अच्छों
को
बीमार
कर
देता
है
बोती
थी
पहले
नफ़रत
सियासत,
मगर
अब
ये
भी
काम
अख़बार
कर
देता
है
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Dileep Kumar
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यूँँ
तो
हर
एक
से
ही
राब्ते
रक्खे
मगर
मुझ
सेे
मिला
तो
फ़ासले
रक्खे
मुहब्बत
जितनी
भी
थी
बस
तुझी
से
थी
किसी
से
फिर
न
कोई
सिलसिले
रक्खे
तिरे
रहम-ओ-करम
से
ही
मिले
सब
ज़ख़्म
मिरे
सब
ज़ख़्म
तू
ने
ही
हरे
रक्खे
ग़ज़ल
के
क़ाफ़िए
बदले,
ग़ज़ल
बदली
ग़ज़ल
के
फिर
म'आनी
भी
नए
रक्खे
न
थी
उम्मीद
उसके
लौट
आने
की
मगर
दरवाजे
सारे
ही
खुले
रक्खे
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Dileep Kumar
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सड़कों
पर
ये
जब
तलक
जलते
रहेंगे
इनके
बच्चे
फूलते
फलते
रहेंगे
साथ
देने
वाला
जब
कोई
न
होगा
शम्स
निकलेंगे
मगर
ढलते
रहेंगे
छोड़
ये
सब
यूँँ
न
आशुफ़्ता
हो
तू
तो
ज़िंदगी
जब
तक
है
हम
चलते
रहेंगे
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Dileep Kumar
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