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"Dharam" Barot
hawa to bas bahaana hai diya bujhne hi vaala tha
hawa to bas bahaana hai diya bujhne hi vaala tha | हवा तो बस बहाना है दिया बुझने ही वाला था
- "Dharam" Barot
हवा
तो
बस
बहाना
है
दिया
बुझने
ही
वाला
था
अमर
कोई
नहीं
सब
कुछ
यहाँ
पर
छोड़
जाना
था
लगाई
थी
किसी
अनजान
ने
आवाज़
तो
देखा
दिखा
था
सिर्फ़
साया
साथ
जो
चलने
ही
वाला
था
- "Dharam" Barot
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हम
को
दिल
से
भी
निकाला
गया
फिर
शहरस
भी
हम
को
पत्थर
से
भी
मारा
गया
फिर
ज़हरस
भी
Azm Shakri
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हवा
जब
चली
फड़फड़ा
कर
उड़े
परिंदे
पुराने
महल्लात
के
Muneer Niyazi
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नहीं
आबो
हवा
में
ताज़गी
अब
दवा
की
सीसियों
में
ज़िन्दगी
है
Umesh Maurya
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नए
दौर
के
नए
ख़्वाब
हैं
नए
मौसमों
के
गुलाब
हैं
ये
मोहब्बतों
के
चराग़
हैं
इन्हें
नफ़रतों
की
हवा
न
दे
Bashir Badr
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न
रूई
हो
तो
अपने
अश्कों
से
बाती
बनाएँगे
बुझा
दीया
हमारा
तो
हवा
से
लड़
भी
जाएँगे
बनाई
रोज़
चौदह
साल
रंगोली
बस
इस
ख़ातिर
न
जाने
रामजी
वनवास
से
कब
लौट
आएंँगे
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Krishnakant Kabk
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पूरी
कायनात
में
एक
क़ातिल
बीमारी
की
हवा
हो
गई
वक़्त
ने
कैसा
सितम
ढाया
कि
दूरियाँ
ही
दवा
हो
गईं
Unknown
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कमरे
में
सिगरेटों
का
धुआँ
और
तेरी
महक
जैसे
शदीद
धुँध
में
बाग़ों
की
सैर
हो
Umair Najmi
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पाँव
रख
गई
है
वो
ज़मीन
पर
अहमियत
बढ़ा
दी
उसने
धूल
की
Nawaaz
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जहाँ
सारे
हवा
बनने
की
कोशिश
कर
रहे
थे
वहाँ
भी
हम
दिया
बनने
की
कोशिश
कर
रहे
थे
Abbas Qamar
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हर
ख़ुशी
मुस्कुरा
के
कहती
है
दर्द
बनकर
छुपे
हुए
हो
तुम
आज
आब-ओ-हवा
में
ख़ुश्बू
है
लग
रहा
है
घुले
हुए
हो
तुम
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Ritesh Rajwada
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गुज़ारी
जाए
ऐसी
ज़िंदगी
कान्हा
करूँँ
बस
मैं
तेरी
ही
बंदगी
कान्हा
"Dharam" Barot
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कहानी
अधूरी
नहीं
छोड़
पाया
कभी
रिश्ता
उस
सेे
नहीं
तोड़
पाया
गिले-शिकवे
कुछ
वक़्त
तक
थे
हमारे
मुँह
इक
वक़्त
तक
भी
नहीं
मोड़
पाया
मुझे
छोड़
देनी
है
दारू
क़सम
से
मरे
थे
क़सम
से
नहीं
छोड़
पाया
ख़ुदा
क्या
तेरा
हाथ
है
सच
बताना
ये
इंसाँ
को
इंसाँ
नहीं
जोड़
पाया
बुरा
मन
के
आईने
में
दिख
ही
जाता
कोई
आईना
ये
नहीं
फोड़
पाया
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"Dharam" Barot
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कहते
हैं
सब
मुझको
कुछ
आता
नहीं
है
मुझको
इस
बारे
में
कुछ
कहना
नहीं
है
आप
अनफ़ॉलो
भी
कर
सकते
है
मुझको
खेल
ये
मैंने
अभी
सीखा
नहीं
है
ख़ूब-सूरत
ज़िंदगी
हैं
बंदगी
कर
रास्ता
ये
इतना
भी
सीधा
नहीं
है
दीप
हर
चिंगारी
से
तुझको
जलाने
और
कुछ
मिसयूज़
भी
करना
नहीं
है
भूमि
थोड़ी
हैं
क़फ़स
हक़
हो
सभी
का
बाँटने
वाला
"धरम"
अच्छा
नहीं
है
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"Dharam" Barot
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जो
ज़िंदगी
थी
ज़िंदगी
रही
नहीं
उदासी
भी
मेरी
मेरी
रही
नहीं
क़रीब
इतना
भी
न
होना
तू
कभी
की
वो
कहे
तेरी
कमी
रही
नहीं
किसान
काम
कर
रहा
है
खेत
में
मगर
ज़मीं
किसानों
की
रहीं
नहीं
लिखा
है
दर्द
को
ग़ज़ल
में
अच्छे
से
सभी
ने
बात
ये
नई
रही
नहीं
ये
बोलने
से
पहले
सोचना
था
दोस्त
थी
दोस्ती
वो
दोस्ती
रही
नहीं
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"Dharam" Barot
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भावना
कर
ले
अगर
वश
धर्म
हे
तू
रास्ता
अमृत
फ़क़त
ये
देख
ले
तू
"Dharam" Barot
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