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"Dharam" Barot
bhavna kar le agar vash dharm he tu
bhavna kar le agar vash dharm he tu | भावना कर ले अगर वश धर्म हे तू
- "Dharam" Barot
भावना
कर
ले
अगर
वश
धर्म
हे
तू
रास्ता
अमृत
फ़क़त
ये
देख
ले
तू
- "Dharam" Barot
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उसे
समझने
का
कोई
तो
रास्ता
निकले
मैं
चाहता
भी
यही
था
वो
बे-वफ़ा
निकले
Waseem Barelvi
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मंज़िलें
क्या
हैं,
रास्ता
क्या
है
हौसला
हो
तो
फ़ासला
क्या
है
Aalok Shrivastav
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फूल
से
लेकर
ये
धनिया
लाने
तक
के
इस
सफ़र
को
मुझको
तेरे
साथ
ही
तय
करने
की
ख़्वाहिश
है
पगली
Harsh saxena
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सफ़र
में
जब
निकल
आए
हो
तो
इतनी
शिकायत
क्यूँ
सड़क
थोड़ी
बहुत
तो
बीच
में
तिरछी
निकलती
है
Pratap Somvanshi
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इस
तरह
करता
है
हर
शख़्स
सफ़र
अपना
ख़त्म
ख़ुद
को
तस्वीर
में
रखता
है
चला
जाता
है
Sandeep kumar
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यहाँ
किसी
को
कोई
रास्ता
नहीं
देता
मुझे
गिरा
के
अगर
तुम
सँभल
सको
तो
चलो
Nida Fazli
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वक़्त
देता
था
वो
मिलने
का
तभी
रक्खी
थी
दोस्त
इक
दौर
था
मैंने
भी
घड़ी
रक्खी
थी
रास्ता
ख़त्म
मकानों
के
तजावुज़
से
हुआ
मैंने
जब
नक़्शा
बनाया
था
गली
रक्खी
थी
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Nadir Ariz
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ज़िंदगी
यूँँ
हुई
बसर
तन्हा
क़ाफ़िला
साथ
और
सफ़र
तन्हा
Gulzar
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एक
मुद्दत
से
हैं
सफ़र
में
हम
घर
में
रह
कर
भी
जैसे
बेघर
से
Azhar Iqbal
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मैं
था
सदियों
के
सफ़र
में
'अहमद'
और
सदियों
का
सफ़र
था
मुझ
में
Ahmad Khayal
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वक़्त
से
पहले
गया
था
छोड़
मुझको
अजनबी
ऐसे
गया
था
तोड़
मुझको
था
कठिन
कुछ
वक़्त
तक
मेरा
सँभलना
फिर
किसी
ने
ये
कहा
था
जोड़
मुझको
दर्द
उस
में
कुछ
ज़ियादा
ही
दिखा
था
दर्द
को
मेरे
कहा
था
छोड़
मुझको
रास्ते
खाई
से
चुनते
हम
ख़ुदी
और
कहना
पड़ता
है
ख़ुदी
को
मोड़
मुझको
आख़िरी
अपलोड
करने
वाला
था
मैं
साथ
मेरे
ही
चली
थी
छोड़
मुझको
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"Dharam" Barot
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सभी
औरत
को
होता
शौक़
ज़ेवर
का
पढ़ाया
बच्चा
छोड़ा
शौक़
ज़ेवर
का
कमाया
बच्चा
माँ
ने
माँगे
थे
कंगन
लगा
बेटे
को
कैसा
शौक़
ज़ेवर
का
बढ़ा
था
ख़र्च
पोता
अब
पढ़े
कैसे
तभी
फिर
काम
आया
शौक़
ज़ेवर
का
दिखावा
या
ज़रूरत
कौन
ये
समझे
ये
किसके
वास्ते
था
शौक़
ज़ेवर
का
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"Dharam" Barot
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वो
आफ़ताब
बना
था
हाँ
दिन
में
मेरे
लिए
सुकून
देता
था
महताब
बन
के
रात
को
भी
"Dharam" Barot
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सवाल
के
जवाब
का
था
इंतिज़ार
रखा
था
मुस्कुराके
क़िस्सा
बरक़रार
हाँ
भी
नहीं
कहा
न
भी
नहीं
कहा
किसी
ने
ऐसे
छीना
था
मेरा
क़रार
दिए
थे
तोड़
एक
से
ज़ियादा
दिल
कहा
था
तब
ये
बे-वफ़ा
का
रोज़गार
गया
है
पहले
भी
कोई
मुझे
यूँँ
छोड़
नया
नहीं
है
कुछ
हो
जा
तू
भी
फ़रार
किया
था
शोर
दर्द
को
छलक
ने
दो
किसी
ने
भी
सुनी
नहीं
मेरी
पुकार
की
बंदगी
धरम
ख़ुदा
समझ
के
और
वो
कह
रहा
है
मुझ
पे
भूत
है
सवार
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"Dharam" Barot
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जाँ
से
ज़ियादा
भी
कोई
भा
सकता
है
फिर
कैसे
कोई
ओर
भी
आ
सकता
है
तनहाई
ने
ऐसी
बनाई
है
जगह
जो
जाना
चाहे
छोड़
कर
जा
सकता
है
ये
ज़िंदगी
इक
ख़्वाब
बन
जानी
कभी
हाँ
ख़्वाब
में
इंसान
सब
पा
सकता
है
इक
बाप
ये
कोशिश
में
रहता
कैसे
वो
बच्चों
के
चेहरे
पर
ख़ुशी
ला
सकता
है
इंसान
से
इंसानियत
का
नाता
और
इंसान
को
इंसान
भी
खा
सकता
है
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