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"Dharam" Barot
har jaan jab ghanshyaam si lagne lage
har jaan jab ghanshyaam si lagne lage | हर जान जब घनश्याम सी लगने लगे
- "Dharam" Barot
हर
जान
जब
घनश्याम
सी
लगने
लगे
संसार
सारा
स्वर्ग
ही
लगने
लगे
- "Dharam" Barot
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झुके
तो
जन्नत
उठे
तो
ख़ंजर
करेंगी
हम
को
तबाह
आँखें
Parul Singh "Noor"
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हम
को
मालूम
है
जन्नत
की
हक़ीक़त
लेकिन
दिल
के
ख़ुश
रखने
को
'ग़ालिब'
ये
ख़याल
अच्छा
है
Mirza Ghalib
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मिरे
माँ
बाप
जन्नत
से
नज़र
रखते
हैं
मुझ
पर
अब
मिरे
दिल
में
यतीमों
के
लिए
इक
ख़ास
कोना
है
Amaan Pathan
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अभी
तो
शाम
की
दस्तक
हुई
है
अभी
से
लग
गया
बिस्तर
हमारा
यही
तन्हाई
है
जन्नत
हमारी
इसी
जन्नत
में
है
अब
घर
हमारा
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Vikas Sharma Raaz
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मैं
सालों
बाद
जब
भी
गाँव
जाता
हूँ
लिए
पीपल
की
ठंडी
छाँव
जाता
हूँ
कहीं
मैली
न
हो
जाए
ये
जन्नत
मैं
माँ
के
पास
नंगे
पाँव
जाता
हूँ
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Ashok Sagar
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है
दु'आ
जल्दी
जन्नत
अता
हो
तुझे
तू
मेरे
इश्क़
का
इश्क़
है
ऐ
रक़ीब
Prit
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चलती
फिरती
हुई
आँखों
से
अज़ाँ
देखी
है
मैं
ने
जन्नत
तो
नहीं
देखी
है
माँ
देखी
है
Munawwar Rana
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नहीं
हर
चंद
किसी
गुम-शुदा
जन्नत
की
तलाश
इक
न
इक
ख़ुल्द-ए-तरब-नाक
का
अरमाँ
है
ज़रूर
बज़्म-ए-दोशंबा
की
हसरत
तो
नहीं
है
मुझ
को
मेरी
नज़रों
में
कोई
और
शबिस्ताँ
है
ज़रूर
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Asrar Ul Haq Majaz
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इसी
दुनिया
में
दिखा
दें
तुम्हें
जन्नत
की
बहार
शैख़
जी
तुम
भी
ज़रा
कू-ए-बुताँ
तक
आओ
Ali Sardar Jafri
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हमेशा
साथ
सबके
तो
ख़ुदा
भी
रह
नहीं
सकता
बनाकर
औरतें
उसने
ज़मीं
को
यूँँ
किया
जन्नत
Anukriti 'Tabassum'
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किसी
की
चाह
रुक
जाती
है
तन
तक
किसी
को
साथ
उड़ना
है
गगन
तक
की
थी
ख़्वाहिश
सभी
की
जिसने
पूरी
रखी
थी
अपनी
ख़्वाहिश
अपने
मन
तक
कमाने
में
फँसा
हूँ
ऐसे
मैं
यार
अकेली
रूह
जाएगी
वतन
तक
कहा
था
ना
गुमाँ
में
उसने
मुझको
तभी
ये
बात
पहुँची
है
जलन
तक
न
छेड़ो
दर्द
को
मेरे
ज़ियादा
धरम
इस
बात
को
रहने
दो
फ़न
तक
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"Dharam" Barot
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परंपरा
बदल
गई
बढ़े
हैं
दाम
काँसे
के
फ़क़ीरों
ने
बदल
दिया
है
ख़ुद
को
बनियों
की
तरह
"Dharam" Barot
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इसी
हाल
में
रहने
देना
था
मुझको
ये
अश्कों
में
बस
बहने
देना
था
मुझको
सुना
ग़ौर
से
मैने
तब
आपको
भी
मेरी
बात
को
कहने
देना
था
मुझको
उठाकर
गिराने
से
अच्छा
जहाँ
था
वही
पर
पड़ा
रहने
देना
था
मुझको
सुना
आपका
क्यूँ
न
सोचा
ज़रा
सा
मेरे
घर
में
तो
सहने
देना
था
मुझको
कभी
कोई
क़ीमत
न
मेरी
लगाए
इसी
रूप
में
बहने
देना
था
मुझको
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"Dharam" Barot
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सेठ
अनपढ़
नेता
अनपढ़
ये
कहानी
है
बताई
देश
में
ऐसी
पढ़ाई
की
दशा
किसने
बनाई
"Dharam" Barot
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जिसे
चाहें
उसे
मर
क्यूँ
कहे
हम
यही
अच्छा
अकेले
ही
भले
हम
बदल
जाती
ज़रूरत
वक़्त
के
साथ
भरोसा
वक़्त
पर
कैसे
करे
हम
गुमाँ
था
चाँद
को
तोड़ा
था
वो
भी
उसे
दी
रौशनी
सूरज
बने
हम
सुकूँ
देती
थी
ऐसे
हर
किसी
को
कि
ख़ुद
की
आग
में
ख़ुद
ही
जले
हम
धरम
इक
बार
भी
गर
देखले
वो
लगेगा
काम
से
ही
अब
गए
हम
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"Dharam" Barot
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