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"Dharam" Barot
main neta salary bhi daan kar deta
main neta salary bhi daan kar deta | मैं नेता सैलरी भी दान कर देता
- "Dharam" Barot
मैं
नेता
सैलरी
भी
दान
कर
देता
लिए
बिन
सैलरी
घर
अपना
भर
देता
मेरा
क्या
है
हूँ
मैं
इक
आम
सा
इंसान
मुझे
इन
सब
से
क्या
मैं
सिर्फ़
कर
देता
दिए
मैंने
थे
जितनी
बार
जाकर
वोट
नया
क्या
धरम
या
फिर
जात
पर
देता
तुझे
बदलाव
लाना
है
मगर
तू
भी
इमोशन
से
धरम
सच
झूठ
कर
देता
- "Dharam" Barot
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मज़हब
से
मेरे
क्या
तुझे
मेरा
दयार
और
मैं
और
यार
और
मिरा
कारोबार
और
Meer Taqi Meer
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हम
ऐसे
सुनते
हैं
उसकी
बातों
को
जैसे
कोई
सूफ़ी
गाने
सुनता
है
Tanoj Dadhich
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न
तीर्थ
जा
कर
न
धर्म
ग्रंथो
का
सार
पा
कर
सुकूँ
मिला
है
मुझे
तो
बस
तेरा
प्यार
पा
कर
ग़रीब
बच्चे
किताब
पढ़
कर
सँवर
रहे
हैं
अमीर
लड़के
बिगड़
रहे
हैं
दुलार
पा
कर
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Alankrat Srivastava
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अल्लाह
बना
दे
मिरे
अश्कों
को
कबूतर
सब
पूछ
रहे
हैं
तिरे
रूमाल
में
क्या
है
Khan Janbaz
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'मीर'
के
दीन-ओ-मज़हब
को
अब
पूछते
क्या
हो
उन
ने
तो
क़श्क़ा
खींचा
दैर
में
बैठा
कब
का
तर्क
इस्लाम
किया
Meer Taqi Meer
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पहले
पहल
तो
लड़
लिए
अल्लाह
से
मगर
अब
पेश
आ
रहे
हैं
बड़ी
आजिज़ी
से
हम
Amaan Pathan
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तुम्हें
ये
किसने
कहा
रब
को
नहीं
मानता
मैं
ये
और
बात
कि
मज़हब
को
नहीं
मानता
मैं
Bhaskar Shukla
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ये
मय-कदा
है
यहाँ
हैं
गुनाह
जाम-ब-दस्त
वो
मदरसा
है
वो
मस्जिद
वहाँ
मिलेगा
सवाब
Ali Sardar Jafri
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क़ौम-ओ-मज़हब
क्या
किसी
का
और
क्या
है
रंग-ओ-नस्ल
ऐसी
बातें
छोड़
कर
बस
इल्म-ओ-फ़न
की
बात
हो
Sayan quraishi
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कभी
अल्लाह
मियाँ
पूछेंगे
तब
उनको
बताएँगे
किसी
को
क्यूँ
बताएँ
हम
इबादत
क्यूँ
नहीं
करते
Farhat Ehsaas
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पहले
रुक
जाओ
समझ
लेने
के
बाद
फिर
मुझे
देखो
समझ
लेने
के
बाद
हाँ
अभी
करना
ज़रूरी
भी
नहीं
सोच
कर
आओ
समझ
लेने
के
बाद
इश्क़
में
बर्बाद
होना
चाहिए
पर
मोहब्बत
को
समझ
लेने
के
बाद
मैं
अकेला
ही
सही
था
जब
लगे
आईना
देखो
समझ
लेने
के
बाद
मुस्कुराहट
से
'धरम'
क्या
समझे
तुम
और
कुछ
समझो
समझ
लेने
के
बाद
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"Dharam" Barot
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मोर्चा
हमने
सँभाला
है
ये
भी
इक
वहम
था
खेल
हर
दिन
ही
पलट
देता
खिलाड़ी
इक
नया
"Dharam" Barot
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ज़माना
बात
करता
है
नई
हर
दिन
सो
उस
पर
सोचना
भी
क्या
सही
हर
दिन
चले
जाते
हो
हर
दिन
देख
कर
मुझको
बताओ
साथ
रहना
है
कभी
हर
दिन
की
थी
तारीफ़
झूठी
और
ऐसे
ही
मुसीबत
इक
गले
आकर
पड़ी
हर
दिन
किया
मिलके
डिसाइड
रुक
गया
रिश्ता
मगर
वो
याद
आती
है
घड़ी
हर
दिन
निकलना
पड़ता
है
उस
दर्द
से
आगे
मगर
रहनी
है
आँखों
में
नमी
हर
दिन
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"Dharam" Barot
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हर
पान
जब
घनश्याम
सा
लगने
लगे
पर्यावरण
तब
गोपिका
लगने
लगे
"Dharam" Barot
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प्रेम
प्लेटोनिक
है
समझा
ही
नहीं
जिस्म
छूना
प्रेम
उसका
तो
फ़क़त
"Dharam" Barot
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