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"Dharam" Barot
har paan jab ghanshyaam sa lagne lage
har paan jab ghanshyaam sa lagne lage | हर पान जब घनश्याम सा लगने लगे
- "Dharam" Barot
हर
पान
जब
घनश्याम
सा
लगने
लगे
पर्यावरण
तब
गोपिका
लगने
लगे
- "Dharam" Barot
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पहले
रुक
जाओ
समझ
लेने
के
बाद
फिर
मुझे
देखो
समझ
लेने
के
बाद
हाँ
अभी
करना
ज़रूरी
भी
नहीं
सोच
कर
आओ
समझ
लेने
के
बाद
इश्क़
में
बर्बाद
होना
चाहिए
पर
मोहब्बत
को
समझ
लेने
के
बाद
मैं
अकेला
ही
सही
था
जब
लगे
आईना
देखो
समझ
लेने
के
बाद
मुस्कुराहट
से
'धरम'
क्या
समझे
तुम
और
कुछ
समझो
समझ
लेने
के
बाद
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कर
रहा
ता'रीफ़
देखो
हो
गया
ता'रीफ़
काबिल
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डर
ज़िंदगी
में
कौन
रखना
चाहता
क्यूँ
तू
जवानी
मौन
रखना
चाहता
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वफ़ा
के
फूल
वो
हर
दिन
ही
लाता
था
किसी
दिन
बिन
बताए
छोड़
जाता
था
ख़ुशी
से
झूम
उठता
याद
में
उसकी
मोहब्बत
में
कहाँ
से
दर्द
आता
था
मुझे
लगने
लगा
आगे
बढ़ा
जाए
मोहब्बत
मेरी
कोई
और
पाता
था
उसे
लगता
मुझे
उस
सेे
मोहब्बत
है
मोहब्बत
में
वो
ऐसे
धोखा
खाता
था
इसे
तुम
नाम
कोई
भी
दे
सकते
हो
हमारे
बीच
कोई
पक्का
नाता
था
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मुझे
अपना
लगा
होता
है
कोई
और
चला
वो
भी
गया
आया
है
कोई
और
निकाली
ख़ामियाँ
अनजान
ने
पल
पल
बताई
जिसने
वो
अपना
है
कोई
और
लगाए
पेड़
जिसके
वास्ते
जाते
ज़मीं
को
बेच
फल
खाता
है
कोई
और
नहीं
है
ख़ून
के
रिश्ते
हमारे
पर
ये
जो
है
दोस्ती
नाता
है
कोई
और
क़ुबूलों
गलतियाँ
तुम
भी
धरम
अपनी
ग़ज़ल
के
बाद
ये
चेहरा
है
कोई
और
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