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Armaan khan
jis-jiski zabaan bol rahi pyaar marengay
jis-jiski zabaan bol rahi pyaar marengay | जिस-जिसकी ज़बाँ बोल रही प्यार, मरेंगे
- Armaan khan
जिस-जिसकी
ज़बाँ
बोल
रही
प्यार,
मरेंगे
मैं
लिखता
हूँ
ले
जाओ,
मेरे
यार
मरेंगे
मेरी
तो
मोहब्बत
में
फ़क़त
हार
हुई
है
उस
लड़की
पे
तुम
देखना
दो
चार
मरेंगे
- Armaan khan
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लिपट
जाता
हूँ
माँ
से
और
मौसी
मुस्कुराती
है
मैं
उर्दू
में
ग़ज़ल
कहता
हूँ
हिंदी
मुस्कुराती
है
Munawwar Rana
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मिरी
ज़बान
के
मौसम
बदलते
रहते
हैं
मैं
आदमी
हूँ
मिरा
ए'तिबार
मत
करना
Asim Wasti
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अगर
है
इश्क़
सच्चा
तो
निगाहों
से
बयाँ
होगा
ज़बाँ
से
बोलना
भी
क्या
कोई
इज़हार
होता
है
Bhaskar Shukla
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फिर
चाहे
तो
न
आना
ओ
आन
बान
वाले
झूटा
ही
वअ'दा
कर
ले
सच्ची
ज़बान
वाले
Arzoo Lakhnavi
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हिन्दी
महक
रही
है
लोबान
जैसी
मेरी
लहजे
को
मैं
ने
अपने
उर्दू
किया
हुआ
है
Prof. Rehman Musawwir
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मैं
हिंदी
और
उर्दू
को
अलग
कैसे
करूँँ
यारों
अगर
साँसें
हटा
दूँ
तो
बदन
में
कुछ
नहीं
बचता
Umesh Maurya
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ज़बाँ
हमारी
न
समझा
यहाँ
कोई
'मजरूह'
हम
अजनबी
की
तरह
अपने
ही
वतन
में
रहे
Majrooh Sultanpuri
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सब
इंतज़ार
में
थे
कब
कोई
ज़बान
खुले
फिर
उसके
होंठ
खुले
और
सबके
कान
खुले
Umair Najmi
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बात
करने
का
हसीं
तौर-तरीक़ा
सीखा
हम
ने
उर्दू
के
बहाने
से
सलीक़ा
सीखा
Manish Shukla
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मिल
गए
थे
एक
बार
उस
के
जो
मेरे
लब
से
लब
उम्र
भर
होंटों
पे
अपने
मैं
ज़बाँ
फेरा
किया
Jurat Qalandar Bakhsh
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शहर
की
भीड़,चकाचौंध
से
उकताए
हुए
ऐसे
उकताए
हुए
लोग
कहाँ
जीते
हैं
मुझ
सेे
मत
पूछ,मेरी
आँख
का
सूनापन
देख
तेरे
ठुकराए
हुए
लोग
कहाँ
जीते
हैं
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Armaan khan
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तेरी
क़िस्मत
कहाँ-कहाँ,
और
मैं
एक
वीरान
सा
मकाँ
और
मैं
दूर
तक
आ
रहा
नज़र
कुछ
तो
एक
सिगरेट
का
धुआँ
और
मैं
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Armaan khan
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भटकती
रूहों
का
बोझ
कब
तक
कोई
उठाता
कहीं
ठहरता,पनाह
लेता,
तो
साथ
होता
मैं
जिस
'अक़ीदत
के
साथ
उसको
भुला
रहा
हूँ
उसी
'अक़ीदत
से
चाह
लेता,
तो
साथ
होता
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Armaan khan
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हर
एक
चीज़
वहीं
है
जहाँ
पे
छोड़ी
थी
बस
एक
घर
ही
नहीं
आ
रहा
नज़र
घर
में
Armaan khan
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मैं
इक
ख़याल
की
दुनिया
का
शाहज़ादा
हूँ
मेरे
ख़याल
की
क्यारी
का
फूल
थी
तुम
भी
मैं
एक
बार
मोहब्बत
में
फिर
शिकस्ता
रहा
सो
बेबसी
में
ये
कहता
हूँ
भूल
थी
तुम
भी
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Armaan khan
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