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Armaan khan
thodii miTTi goonth aur ik dil banaa
thodii miTTi goonth aur ik dil banaa | थोड़ी मिट्टी गूँथ और इक दिल बना
- Armaan khan
थोड़ी
मिट्टी
गूँथ
और
इक
दिल
बना
कुछ
न
कर
रस्ते
को
ही
मंज़िल
बना
उसकी
हालत
पर
मैं
रोया
देर
तक
वो
मुझे
कहता
था
मुस्तक़बिल
बना
चाय
पर
चर्चा
चली
थी
इश्क़
पर
और
फिर
दोनों
का
अपना
बिल
बना
- Armaan khan
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एक
मुझे
ख़्वाब
देखने
के
सिवा
चाय
पीने
की
गंदी
आदत
है
Balmohan Pandey
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चाय
के
बारे
में
कोई
राय
मत
दो
यार
मुझको
बात
समझो
इश्क़
सब
सेे
पूछकर
होता
नहीं
है
Neeraj Neer
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चाय
पीते
हैं
कहीं
बैठ
के
दोनों
भाई
जा
चुकी
है
ना
तो
बस
छोड़
चल
आ
जाने
दे
Ali Zaryoun
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चाय
की
प्याली
में
नीली
टेबलेट
घोली
सह
में
सह
में
हाथों
ने
इक
किताब
फिर
खोली
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Bashir Badr
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हम
इक
ही
लौ
में
जलाते
रहे
ग़ज़ल
अपनी
नई
हवा
से
बचाते
रहे
ग़ज़ल
अपनी
दरअस्ल
उसको
फ़क़त
चाय
ख़त्म
करनी
थी
हम
उसके
कप
को
सुनाते
रहे
ग़ज़ल
अपनी
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Zubair Ali Tabish
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नाज़-ओ-नख़रे
क्या
उठाए,
क्या
सुने
उस
के
गिले
देखते
ही
देखते
लड़की
घमंडी
हो
गई
देखते
रहने
में
उस
को
और
क्या
होता,
मगर
जो
थी
जान-ए-आरज़ू,
वो
चाय
ठंडी
हो
गई
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Kazim Rizvi
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ज़िक्र
तुम्हारा
बहुत
ज़रूरी
इन
ग़ज़लों
में
जानेमन
चाय
बिना
अदरक
को
डाले
अच्छी
थोड़ी
बनती
है
Tanoj Dadhich
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बस
एक
रस्म-ए-तअल्लुक़
निभाने
बैठे
हैं
वगरना
दोनों
के
कप
में
ज़रा
भी
चाय
नहीं
Waseem Nadir
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सिगरटें
चाय
धुआँ
रात
गए
तक
बहसें
और
कोई
फूल
सा
आँचल
कहीं
नम
होता
है
Wali Aasi
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आज
फिर
चाय
बनाते
हुए
वो
याद
आया
आज
फिर
चाय
में
पत्ती
नहीं
डाली
मैं
ने
Taruna Mishra
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ऐ
दिल-ए-हक़
शनास
दुनिया
है
न
लगा
इस
सेे
आस,
दुनिया
है
रूह
को
है
तेरी
ख़ुदा
की
तलब
और
तेरे
आस
पास
दुनिया
है
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Armaan khan
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मौत
का
इंतिज़ार
किसको
है?
नींद
का
है,
मगर
नहीं
आती
Armaan khan
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सवाल
इसका
नहीं
है
कि
क्यूँ
उदास
हूँ
मैं
अज़ाब
ये
है
कि
घर
जा
के
मुस्कुराना
है
Armaan khan
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हुस्न
का
इम्कान
समझा
देर
से
मैं
नफ़ा-नुक़्सान
समझा
देर
से
उसके
'आशिक़
उसके
बारे
में
मेरा
भर
रहे
थे
कान,समझा
देर
से
मुझको
पहले
दिन
से
उस
सेे
इश्क़
था
और
वो
नादान
समझा
देर
से
जो
समझना
ज़िन्दगी
की
शर्त
थी
उसको
ही
इंसान
समझा
देर
से
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Armaan khan
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तुम्हारा
ज़िक्र
चला
है
हमारे
घर
में
फिर
हम
एक
कोने
में
बैठे
हैं
मुस्कुरा
रहे
हैं
Armaan khan
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