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Mohd Arham
mujhe ab eid kii khushiyaan nahin hai
mujhe ab eid kii khushiyaan nahin hai | मुझे अब ईद की ख़ुशियाँ नहीं है
- Mohd Arham
मुझे
अब
ईद
की
ख़ुशियाँ
नहीं
है
कहीं
तो
खो
गया
बचपन
हमारा
- Mohd Arham
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लटकन
झटकन
ओढ़
मटकते
एक
परी
का
दिख
जाना,
प्लेन
गुजरने
पर
बचपन
के
ख़ुश
होने
सा
लगता
है!
बिन्दी,
लिपस्टिक,
चूड़ी,
कंगन
और
किनारा
साड़ी
का,
लाल
कलर
पर
कब्ज़ा
अय
हय
कितना
अच्छा
लगता
है!
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Atul K Rai
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दुनिया
जिसे
कहते
हैं
जादू
का
खिलौना
है
मिल
जाए
तो
मिट्टी
है
खो
जाए
तो
सोना
है
Nida Fazli
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अब
तक
हमारी
उम्र
का
बचपन
नहीं
गया
घर
से
चले
थे
जेब
के
पैसे
गिरा
दिए
Nashtar Khaanqahi
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छोड़
कर
जाने
का
मंज़र
याद
है
हर
सितम
तेरा
सितमगर
याद
है
अपना
बचपन
भूल
बैठा
हूँ
मगर
अब
भी
तेरा
रोल
नंबर
याद
है
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Salman Zafar
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तुम
माँग
रहे
हो
मेरे
दिल
से
मेरी
ख़्वाहिश
बच्चा
तो
कभी
अपने
खिलौने
नहीं
देता
Abbas Tabish
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मुहब्बत
याद
बचपन
की
नहीं
है
कवर
टॉफी
का
लेकिन
पास
में
है
Tanoj Dadhich
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घर
लौट
के
रोएँगे
माँ
बाप
अकेले
में
मिट्टी
के
खिलौने
भी
सस्ते
न
थे
मेले
में
Qaisar-ul-Jafri
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मैं
तेरी
गोद
में
कैसा
लगा
था
माँ
तेरा
तो
दूसरा
बचपन
हुआ
था
मैं
Rohit tewatia 'Ishq'
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आज
फिर
माँ
मुझे
मारेगी
बहुत
रोने
पर
आज
फिर
गाँव
में
आया
है
खिलौने
वाला
Nawaz Zafar
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मैं
ने
हाथों
से
बुझाई
है
दहकती
हुई
आग
अपने
बच्चे
के
खिलौने
को
बचाने
के
लिए
Shakeel Jamali
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मुयस्सर
थी
कभी
ये
रात
हम
को
भी
कभी
सोते
थे
हम
भी
चैन
से
अरहम
Mohd Arham
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हमने
जो
भी
किया
वो
बोया
है
उसको
पा
के
भी
हमने
खोया
है
जो
न
रोया
किसी
के
मरने
पर
तेरे
जाने
से
वो
भी
रोया
है
उसने
देखा
नहीं
मुझे
मुड़
के
वो
जो
बाहों
में
मेरे
सोया
है
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Mohd Arham
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मैं
उसको
अपना
सब
कुछ
मानता
था
मेरा
होना
भी
जिसका
मसअला
था
मोहब्बत
ख़त्म
होने
जा
रही
थी
वो
मेरे
साथ
अब
उकता
रहा
था
मेरी
चीखें
भी
सुन
के
वो
न
लौटा
जो
आहट
तक
मेरी
पहचानता
था
रवानी
ख़ून
की
कम
हो
चुकी
थी
गले
मिलना
ज़रूरी
हो
गया
था
वो
मुद्दत
बाद
मुझ
सेे
मिल
रही
थी
मैं
उसको
देखते
ही
रो
पड़ा
था
मेरे
सब
ज़ख़्म
यूँँ
तो
भर
चुके
थे
मगर
वो
मुझ
में
अब
भी
रह
गया
था
गँवा
के
उम्र
अपनी
सारी
'अरहम'
दु'आ
मरने
की
अब
मैं
कर
रहा
था
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Mohd Arham
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जिसे
आते
नहीं
थे
उर्दू
के
मानी
बिछड़
के
तुझ
सेे
वो
अब
ग़ज़लें
कहता
है
Mohd Arham
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इश्क़
दहलीज़
पर
रुका
होगा
वो
मगर
आगे
बढ़
गया
होगा
कौन
जाने
सुकूत
के
अंदर
शोर
कितना
मचल
रहा
होगा
यूँँॅं
नहीं
गिर्या
में
रहीं
आँखें
अब्र
पलकों
पे
रुक
गया
होगा
बिंत-ए-हव्वा
के
फिर
से
चक्कर
में
कोई
आदम
भटक
गया
होगा
दिल
लगाऍंगे
अब
उसी
बुत
से
जो
न
इंसाँ
न
ही
ख़ुदा
होगा
चाँद
सूरज
को
करके
मुट्ठी
में
आसमाँ
में
कहीं
उगा
होगा
तितलियाँ
फूल
चाँदनी
रातें
बाग़
में
उसके
और
क्या
होगा
ख़्वाब
टूटेंगे
किर्चियाँ
बन
कर
आँख
में
जिनके
आइना
होगा
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Mohd Arham
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