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Mohd Afsar
kabhi dekha nahin main inka chehra
kabhi dekha nahin main inka chehra | कभी देखा नहीं मैं इनका चेहरा
- Mohd Afsar
कभी
देखा
नहीं
मैं
इनका
चेहरा
किसी
जानिब
तो
अच्छी
लड़कियाँ
हैं
- Mohd Afsar
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आसमाँ
इतनी
बुलंदी
पे
जो
इतराता
है
भूल
जाता
है
ज़मीं
से
ही
नज़र
आता
है
Waseem Barelvi
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हुस्न
बख़्शा
जो
ख़ुदा
ने
आप
बख़्शें
दीद
अपनी
आरज़ू–ए–चश्म
पूरी
हो
मुकम्मल
ईद
अपनी
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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सब
लोग
जिधर
वो
हैं
उधर
देख
रहे
हैं
हम
देखने
वालों
की
नज़र
देख
रहे
हैं
Dagh Dehlvi
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मुझे
आँखें
दिखाकर
बोलती
है
चुप
रहो
भैया
बहिन
छोटी
भले
हो
बात
वो
अम्मा
सी
करती
है
Divy Kamaldhwaj
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जो
बिस्मिल
बना
दे
वो
क़ातिल
तबस्सुम
जो
क़ातिल
बना
दे
वो
दिलकश
नज़ारा
मोहब्बत
का
भी
खेल
नाज़ुक
है
कितना
नज़र
मिल
गई
आप
जीते
मैं
हारा
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Nushur Wahidi
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देखने
के
लिए
सारा
आलम
भी
कम
चाहने
के
लिए
एक
चेहरा
बहुत
Asad Badayuni
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कोई
चेहरा
किसी
को
उम्र
भर
अच्छा
नहीं
लगता
हसीं
है
चाँद
भी,
शब
भर
मगर
अच्छा
नहीं
लगता
Munawwar Rana
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तुम
तो
सर्दी
की
हसीं
धूप
का
चेहरा
हो
जिसे
देखते
रहते
हैं
दीवार
से
जाते
हुए
हम
Nomaan Shauque
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घूमता
रहता
है
हर
वक़्त
मेरी
आँखों
में
एक
चेहरा
जो
कई
साल
से
देखा
भी
नहीं
Riyaz Tariq
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भूलभुलैया
था
उन
ज़ुल्फ़ों
में
लेकिन
हमको
उस
में
अपनी
राहें
दिखती
थीं
आपकी
आँखों
को
देखा
तो
इल्म
हुआ
क्यूँँ
अर्जुन
को
केवल
आँखें
दिखती
थीं
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Ashraf Jahangeer
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मैं
याद-ए-रफ़्तगाँ
की
याद
में
बहुत
रोया
तभी
तो
वक़्त-ए-मुलाक़ात
में
बहुत
रोया
Mohd Afsar
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तिश्नगी
थी
मुलाक़ात
की
उस
से
हाँ
मैंने
फिर
बात
की
दुश्मनी
मेरी
अब
मौत
से
ज़िंदगी
हाथ
पे
हाथ
की
सादगी
उसकी
देखा
हूँ
मैं
हाँ
वो
लड़की
है
देहात
की
तुमने
वा'दा
किया
था
कभी
याद
है
बात
वो
रात
की
अब
मैं
कैसे
कहूँ
इश्क़
इसे
बात
जब
आ
गई
ज़ात
की
मुझ
सेे
क्या
दुश्मनी
ऐ
घटा
क्यूँ
मेरे
घर
पे
बरसात
की
हमको
मालिक
ने
जितना
दिया
सब
ग़रीबों
में
ख़ैरात
की
तू
कभी
मिल
तो
मालूम
हो
क्या
है
औक़ात
औक़ात
की
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Mohd Afsar
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अपने
मकान-ए-दिल
में
झाँको
तो
कभी
तुम
कहते
हो
किसको
वहाँ
रहता
है
कौन
Mohd Afsar
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मैंने
उसके
कभी
गाल
चू
में
नहीं
मैंने
उसको
रखा
है
उसी
की
तरह
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Mohd Afsar
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दिसम्बर
की
सर्दी
है
बस
तुम
नहीं
हो
अकेली
रज़ाई
से
रुकती
नहीं
ठंड
Mohd Afsar
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