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Zubair Ali Tabish
ghazal to sabko mee
ghazal to sabko mee | ग़ज़ल तो सबको मीठी लग रही थी
- Zubair Ali Tabish
ग़ज़ल
तो
सबको
मीठी
लग
रही
थी
मगर
नातिक
को
मिर्ची
लग
रही
थी
तुम्हारे
लब
नहीं
चू
में
थे
जब
तक
मुझे
हर
चीज़
कड़वी
लग
रही
थी
मैं
जिस
दिन
छोड़ने
वाला
था
उसको
वो
उस
दिन
सब
सेे
प्यारी
लग
रही
थी
- Zubair Ali Tabish
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उस
लब
से
मिल
ही
जाएगा
बोसा
कभी
तो
हाँ
शौक़-ए-फ़ुज़ूल
ओ
जुरअत-ए-रिंदाना
चाहिए
Mirza Ghalib
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अगर
पलक
पे
है
मोती
तो
ये
नहीं
काफ़ी
हुनर
भी
चाहिए
अल्फ़ाज़
में
पिरोने
का
Javed Akhtar
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चश्म
हो
तो
आईना-ख़ाना
है
दहर
मुँह
नज़र
आता
है
दीवारों
के
बीच
Meer Taqi Meer
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इसलिए
नहीं
रोया
अश'आर
में
वज़्न
से
बाहर
थी
मेरी
सिसकियाँ
Saad Ahmad
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रोज़
रोने
के
बहाने
ढूँढ़ते
है
बेबसी
से
अपने
रिश्ते
ख़ून
के
है
देख
लेंगे
फिर
ग़लत
क्या
है
सही
क्या
आ
अभी
इक
दूसरे
को
चूमते
है
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Aman Mishra 'Anant'
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इशरत-ए-क़तरा
है
दरिया
में
फ़ना
हो
जाना
दर्द
का
हद
से
गुज़रना
है
दवा
हो
जाना
Mirza Ghalib
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जब
आँखों
में
लगाता
हूँ
तो
चुपके-चुपके
हंस-हंसकर
तेरी
तस्वीर
भी
कहती
है,
सूरत
ऐसी
होती
है
Dagh Dehlvi
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किसी
ने
मुफ्त
में
वो
शख़्स
पाया
जो
हर
कीमत
पे
मुझको
चाहिए
था
Uzair Hijazi
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एक
दुख
ये
के
तू
मिलने
नहीं
आया
मुझ
सेे
एक
दुख
ये
के
उस
दिन
मेरा
घर
ख़ाली
था
Tehzeeb Hafi
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करके
थोड़ी
हिम्मत
लिखना
चाहता
हूँ
नेताओं
को
लानत
लिखना
चाहता
हूँ
जिसको
पढ़कर
सारे
तुझ
सेे
प्यार
करें
तेरी
ऐसी
सीरत
लिखना
चाहता
हूँ
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Sanskar 'Sanam'
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कोई
पागल
ही
मोहब्बत
से
नवाज़ेगा
मुझे
आप
तो
ख़ैर
समझदार
नज़र
आते
हैं
Zubair Ali Tabish
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तुम्हारा
सिर्फ़
हवाओं
पे
शक
गया
होगा
चराग़
ख़ुद
भी
तो
जल
जल
के
थक
गया
होगा
Zubair Ali Tabish
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पहले
मुफ़्त
में
प्यास
बटेगी
बा'द
में
इक-इक
बूँद
बिकेगी
कितने
हसीं
हो
माशा-अल्लाह
तुम
पे
मोहब्बत
ख़ूब
जचेगी
ज़ालिम
बस
इतना
बतला
दे
क्या
रोने
की
छूट
मिलेगी
आज
तो
पत्थर
बाँध
लिया
है
लेकिन
कल
फिर
भूक
लगेगी
मैं
भी
पागल
तू
भी
पागल
हम
दोनों
की
ख़ूब
जमेगी
यार
ने
पानी
फेर
दिया
है
ख़ाक
हमारी
ख़ाक
उड़ेगी
दुनिया
को
ऐसे
भूलूँगा
दुनिया
मुझ
को
याद
करेगी
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Zubair Ali Tabish
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तुम्हारे
ग़म
से
तौबा
कर
रहा
हूँ
तअ'ज्जुब
है
मैं
ऐसा
कर
रहा
हूँ
है
अपने
हाथ
में
अपना
गिरेबाँ
न
जाने
किस
से
झगड़ा
कर
रहा
हूँ
बहुत
से
बंद
ताले
खुल
रहे
हैं
तिरे
सब
ख़त
इकट्ठा
कर
रहा
हूँ
कोई
तितली
निशाने
पर
नहीं
है
मैं
बस
रंगों
का
पीछा
कर
रहा
हूँ
मैं
रस्मन
कह
रहा
हूँ
फिर
मिलेंगे
ये
मत
समझो
कि
वा'दा
कर
रहा
हूँ
मिरे
अहबाब
सारे
शहर
में
हैं
मैं
अपने
गाँव
में
क्या
कर
रहा
हूँ
मिरी
हर
इक
ग़ज़ल
असली
है
साहब
कई
बरसों
से
धंदा
कर
रहा
हूँ
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Zubair Ali Tabish
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चल
ख़्वाहिश
की
बात
करेंगे
ख़ाली
डिश
की
बात
करेंगे
पहले
प्यासे
तो
बन
जाओ
फिर
बारिश
की
बात
करेंगे
आना
टूटा
रिश्ता
लेकर
गुंजाइश
की
बात
करेंगे
बन्दे
इक
दो
सज्दे
करके
फ़रमाइश
की
बात
करेंगे
तुम
औरों
के
शे'र
सुनाओ
हम
ताबिश
की
बात
करेंगे
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Zubair Ali Tabish
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