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Zohair Ahmad Sahil
us dil men main basaa nahin kya farz kii ada nahin
us dil men main basaa nahin kya farz kii ada nahin | उस दिल में मैं बसा नहीं क्या फ़र्ज़ की अदा नहीं
- Zohair Ahmad Sahil
उस
दिल
में
मैं
बसा
नहीं
क्या
फ़र्ज़
की
अदा
नहीं
वो
कहती
हैं
वफ़ा
नहीं
क्या
मर्ज़
की
दवा
नहीं
ग़म
तो
बहुत
मिले
मगर
ये
ज़ख़्म
तो
सिला
नहीं
तकलीफ़
क्या
कहें
मगर
उस
रस्ते
से
गिला
नहीं
- Zohair Ahmad Sahil
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भँवर
के
बीच
समुंदर
ने
जिस
को
पाला
था
उसे
ज़मीन
ने
साहिल
पे
मार
डाला
था
गवाह
अपने
बयानों
से
फिर
गए
वरना
मैं
अपने
जुर्म
का
इक़रार
करने
वाला
था
ये
राय
किसने
दी
सूरज
को
घूर
कर
देखो
अँधेरा
बन
गया
आँखों
में
जो
उजाला
था
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किसी
को
अपना
बना
रहा
हूँ
वफ़ा
को
दिल
से
निभा
रहा
हूँ
ये
हाल
अपना
बता
रहा
हूँ
ज़वाब
तुमको
सुना
रहा
हूँ
बदल
रहा
हूँ
मैं
वक़्त
मेरा
मैं
अपनी
हस्ती
बचा
रहा
हूँ
कभी
तो
ख़ूँ
में
नहा
रहा
था
अभी
मैं
ख़ुद
को
सजा
रहा
हूँ
हमें
कहानी
सुनाओ
क्यूँ
तुम
मैं
दुनिया
अपनी
बसा
रहा
हूँ
ये
बात
सारी
है
निकली
दिल
से
जो
दिल
था
टूटा
बना
रहा
हूँ
जो
हाल
सारा
सुना
रहा
था
उसी
से
मिलने
को
जा
रहा
हूँ
नया
दिया
इक
जला
रहा
हूँ
मैं
घर
को
'जोहैर'
आ
रहा
हूँ
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दिल
एक
तो
फ़ुन्कारी
है
जिस
पर
शरारत
तारी
है
ये
जो
शिकारी
हैं
नए
इनकी
सदाक़त
प्यारी
है
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इक
दिया
था
ग़म
में
सजा
हुआ
अपने
ही
दम
पर
डटा
हुआ
जिस
की
दीद
थी
मेरी
ज़िंदगी
वो
कहीं
पर
है
सजा
हुआ
Zohair Ahmad Sahil
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अगर
पीछे
ये
दीवाना
पड़ेगा
तुम्हें
इस
दिल
में
बस
जाना
पड़ेगा
मिरी
आवाज़
पहुँचेगी
ज़हाँ
तक
वहाँ
तक
आपको
आना
पड़ेगा
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