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Zohair Ahmad Sahil
bhanwar ke beech samundar ne jis ko paala tha
bhanwar ke beech samundar ne jis ko paala tha | भँवर के बीच समुंदर ने जिस को पाला था
- Zohair Ahmad Sahil
भँवर
के
बीच
समुंदर
ने
जिस
को
पाला
था
उसे
ज़मीन
ने
साहिल
पे
मार
डाला
था
गवाह
अपने
बयानों
से
फिर
गए
वरना
मैं
अपने
जुर्म
का
इक़रार
करने
वाला
था
ये
राय
किसने
दी
सूरज
को
घूर
कर
देखो
अँधेरा
बन
गया
आँखों
में
जो
उजाला
था
- Zohair Ahmad Sahil
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ज़ीस्त
है
मुझ
सेे
ख़फ़ा
लेकिन
गिला
कोई
नहीं
मसअला
ये
है
कि
मेरा
मसअला
कोई
नहीं
कट
रही
है
ज़िंदगी
बेकार
फ़ुर्सत
में
यूँँ
ही
मश्ग़ला
ये
है
कि
मेरा
मश्ग़ला
कोई
नहीं
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Zohair Ahmad Sahil
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अगर
पीछे
ये
दीवाना
पड़ेगा
तुम्हें
इस
दिल
में
बस
जाना
पड़ेगा
मिरी
आवाज़
पहुँचेगी
ज़हाँ
तक
वहाँ
तक
आपको
आना
पड़ेगा
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Zohair Ahmad Sahil
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दिल
चुरा
कर
गया
दिल
लगा
कर
गया
ग़म
का
नग़्मा
यहाँ
गुनगुना
कर
गया
कोई
तो
राज़
दिल
में
दबाए
वो
था
जो
भी
अपनी
वफ़ा
को
मिटा
कर
गया
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Zohair Ahmad Sahil
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दुनिया
बदल
रही
है
नगरी
ये
चल
रही
है
सबको
बनाकर
अपना
बातों
से
जल
रही
है
रातों
में
हर
दिए
की
लौ
भी
दहल
रही
है
जो
ज़िंदगी
थी
मेरी
लड़की
फिसल
रही
है
बर्बाद
करके
मुझको
ख़ुद
तो
सँभल
रही
है
यादों
के
इस
चमन
में
कितना
वो
ढल
रही
है
ख़ुशियाँ
मना
रही
थी
मुझ
को
निगल
रही
है
'जोहैर'
क्या
बताएँ
अब
वो
पिघल
रही
है
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Zohair Ahmad Sahil
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उस
दिल
में
मैं
बसा
नहीं
क्या
फ़र्ज़
की
अदा
नहीं
वो
कहती
हैं
वफ़ा
नहीं
क्या
मर्ज़
की
दवा
नहीं
ग़म
तो
बहुत
मिले
मगर
ये
ज़ख़्म
तो
सिला
नहीं
तकलीफ़
क्या
कहें
मगर
उस
रस्ते
से
गिला
नहीं
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Zohair Ahmad Sahil
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