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Zia Mazkoor
KHuda ka shukr meraa thekedaar achha hai
KHuda ka shukr meraa thekedaar achha hai | ख़ुदा का शुक्र मेरा ठेकेदार अच्छा है
- Zia Mazkoor
ख़ुदा
का
शुक्र
मेरा
ठेकेदार
अच्छा
है
वगरना
कौन
ज़हीफों
से
काम
लेता
है
मिशाल
खान
तेरी
उंगलियां
नहीं
टूटी
हमारी
माओं
के
होटों
का
लम्स
टूटा
है
मैं
उस
हथेली
पे
रौशन
हुआ
,
उसके
बाद
वही
हुआ
जो
चिराग़ों
के
साथ
होता
है
- Zia Mazkoor
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दौलत
शोहरत
बीवी
बच्चे
अच्छा
घर
और
अच्छे
दोस्त
कुछ
तो
है
जो
इन
के
बाद
भी
हासिल
करना
बाक़ी
है
कभी-कभी
तो
दिल
करता
है
चलती
रेल
से
कूद
पड़ूॅं
फिर
कहता
हूॅं
पागल
अब
तो
थोड़ा
रस्ता
बाक़ी
है
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ऐसे
उस
हाथ
से
गिरे
हम
लोग
टूटते
टूटते
बचे
हम
लोग
अपना
क़िस्सा
सुना
रहा
है
कोई
और
दीवार
के
बने
हम
लोग
वस्ल
के
भेद
खोलती
मिट्टी
चादरें
झाड़ते
हुए
हम
लोग
उस
कबूतर
ने
अपनी
मर्ज़ी
की
सीटियाँ
मारते
रहे
हम
लोग
पूछने
पर
कोई
नहीं
बोला
कैसे
दरवाज़ा
खोलते
हम
लोग
हाफ़िज़े
के
लिए
दवा
खाई
और
भी
भूलने
लगे
हम
लोग
ऐन
मुमकिन
था
लौट
आता
वो
उस
के
पीछे
नहीं
गए
हम
लोग
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चारा-गर
ऐ
चारा-गर
चिल्लाती
थी
ज़ख़्मों
को
भी
हाथ
नहीं
लगवाती
थी
पता
नहीं
कैसा
माहौल
था
उसके
घर
बुर्का
पहन
के
शर्टें
लेने
आती
थी
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किस
तरह
ईमान
लाऊँ
ख़्वाब
की
ता'बीर
पर
छिपकली
चढ़ते
हुए
देखी
है
उस
तस्वीर
पर
उसने
ऐसी
कोठरी
में
क़ैद
रक्खा
था
हमें
रौशनी
आँखों
पे
पड़ती
थी
या
फिर
ज़ंजीर
पर
माएँ
बेटों
से
ख़फ़ा
हैं
और
बेटे
माओं
से
इश्क़
ग़ालिब
आ
गया
है
दूध
की
तासीर
पर
मैं
उन्हीं
आबादियों
में
जी
रहा
होता
कहीं
तुम
अगर
हँसते
नहीं
उस
दिन
मेरी
तक़दीर
पर
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Zia Mazkoor
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हवा
चली
तो
उसकी
शॉल
मेरी
छत
पे
आ
गिरी
ये
उस
बदन
के
साथ
मेरा
पहला
राब्ता
हुआ
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