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Zafar Siddqui
jang maidan-e-jang men hogii
jang maidan-e-jang men hogii | जंग मैदान-ए-जंग में होगी
- Zafar Siddqui
जंग
मैदान-ए-जंग
में
होगी
क़त्ल
भी
अब
किसी
को
होना
है
- Zafar Siddqui
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पूरी
कायनात
में
एक
क़ातिल
बीमारी
की
हवा
हो
गई
वक़्त
ने
कैसा
सितम
ढाया
कि
दूरियाँ
ही
दवा
हो
गईं
Unknown
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यूँँ
बे-तरतीब
ज़ख़्मों
ने
बताया
राज़
क़ातिल
का
सलीके
से
जो
मेरा
क़त्ल
गर
होता
तो
क्या
होता
Vikram Gaur Vairagi
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क़त्ल
से
पहले
वो
हर
शख़्स
के
दिल
की
हसरत
पूछ
लेता
था
मगर
पूरी
नहीं
करता
था
Vishnu virat
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दामन
पे
कोई
छींट
न
ख़ंजर
पे
कोई
दाग़
तुम
क़त्ल
करो
हो
कि
करामात
करो
हो
Kaleem Aajiz
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पूछे
हैं
वजह-ए-गिरिया-ए-ख़ूनी
जो
मुझ
सेे
लोग
क्या
देखते
नहीं
हैं
सब
उस
बे-वफ़ा
का
रंग
Meer Taqi Meer
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चुरायगा
उसी
से
आँख
क़ातिल
ज़रा
सी
जान
जिस
बिस्मिल
में
होगी
Dagh Dehlvi
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तेग़-बाज़ी
का
शौक़
अपनी
जगह
आप
तो
क़त्ल-ए-आम
कर
रहे
हैं
Jaun Elia
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वो
क़त्ल
कर
के
मुझे
हर
किसी
से
पूछते
हैं
ये
काम
किसने
किया
है,
ये
काम
किस
का
था?
Dagh Dehlvi
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काम
अब
कोई
न
आएगा
बस
इक
दिल
के
सिवा
रास्ते
बंद
हैं
सब
कूचा-ए-क़ातिल
के
सिवा
Ali Sardar Jafri
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है
किसी
जालिम
उदू
की
घात
दरवाज़े
में
है
या
मसाफ़त
है
नई
या
रात
दरवाज़े
में
है
जिस
तरहा
उठती
है
नजरें
बे-इरादा
बार-बार
साफ़
लगता
है
के
कोई
बात
दरवाजे
में
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Farhat Abbas Shah
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यूँँ
कोई
बे
वफ़ा
नहीं
होता
बे
सबब
ही
जुदा
नहीं
होता
आ
गए
लोग
कुछ
मदद
करने
हर
कोई
तो
बुरा
नहीं
होता
किस
घड़ी
किस
को
मौत
आ
जाए
ये
किसी
को
पता
नहीं
होता
जंग
दुश्मन
से
जीत
ली
मैंने
हौसला
हो
तो
क्या
नहीं
होता
ऐसे
रस्ते
पे
चल
पड़ा
हूँ
मैं
ख़त्म
ही
रास्ता
नहीं
होता
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Zafar Siddqui
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जो
अदब
की
है
पहचान
पढ़ता
हूँ
मैं
मीर-ओ-ग़ालिब
का
दीवान
पढ़ता
हूँ
मैं
मत
पढ़ाओ
मुझे
पाठ
नफ़रत
का
तुम
अम्न
जिस
में
है
क़ुरआन
पढ़ता
हूँ
मैं
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Zafar Siddqui
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मिल
रहा
है
गले
ज़फ़र
दुश्मन
ईद
ऐसी
बहार
लाई
है
Zafar Siddqui
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मुहब्बत
ये
मुहब्बत
वो
मुहब्बत
सिवाए
दर्द-ओ-ग़म
के
कुछ
नहीं
है
Zafar Siddqui
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ख़्वाब
ये
जाने
क्यूँ
मुझ
को
शब
आ
गए
प्यासे
लब
पर
मिरे
तेरे
लब
आ
गए
मैं
तो
मदहोश
बाँहों
में
तेरी
हुआ
दिन
मिरे
यानी
अच्छे
ही
अब
आ
गए
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Zafar Siddqui
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