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Zeeshan kaavish
hamne watan ke vaaste kya khoob likh diya
hamne watan ke vaaste kya khoob likh diya | हमने वतन के वास्ते क्या ख़ूब लिख दिया
- Zeeshan kaavish
हमने
वतन
के
वास्ते
क्या
ख़ूब
लिख
दिया
हमने
वतन
को
अपना
ही
महबूब
लिख
दिया
- Zeeshan kaavish
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मज़हब
नहीं
सिखाता
आपस
में
बैर
रखना
हिन्दी
हैं
हम
वतन
है
हिन्दोस्ताँ
हमारा
Allama Iqbal
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काम
आया
तिरंगा
कफ़न
के
लिए
कोई
क़ुर्बां
हुआ
था
वतन
के
लिए
सोचो
क्या
कर
लिया
तुमने
जी
कर
के
दोस्त
नस
भी
काटी
तो
बस
इक
बदन
के
लिए
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Neeraj Neer
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सभी
का
ख़ून
है
शामिल
यहाँ
की
मिट्टी
में
किसी
के
बाप
का
हिन्दुस्तान
थोड़ी
है
Rahat Indori
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दिल
से
निकलेगी
न
मर
कर
भी
वतन
की
उल्फ़त
मेरी
मिट्टी
से
भी
ख़ुशबू-ए-वफ़ा
आएगी
Lal Chand Falak
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पारा-ए-दिल
है
वतन
की
सर
ज़मीं
मुश्किल
ये
है
शहर
को
वीरान
या
इस
दिल
को
वीराना
कहें
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Majrooh Sultanpuri
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खाक
हो
जाएँगे
हम
खाक
में
मिल
कर
तेरी
तुझ
सेे
रिश्ता
न
कभी
अरज़े
वतन
टूटेगा
Hashim Raza Jalalpuri
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मैं
जब
मर
जाऊँ
तो
मेरी
अलग
पहचान
लिख
देना
लहू
से
मेरी
पेशानी
पे
हिंदुस्तान
लिख
देना
Rahat Indori
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कहीं
से
दुख
तो
कहीं
से
घुटन
उठा
लाए
कहाँ-कहाँ
से
न
दीवानापन
उठा
लाए
अजीब
ख़्वाब
था
देखा
के
दर-ब-दर
हो
कर
हम
अपने
मुल्क
से
अपना
वतन
उठा
लाए
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Farhat Abbas Shah
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ये
सोचके
तो
दूसरी
कोई
मिट्टी
को
छु'आ
नहीं
के
बाद
मरने
के
हिन्दुस्तां
में
दफनाया
जाऊंगा
karan singh rajput
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ज़बाँ
हमारी
न
समझा
यहाँ
कोई
'मजरूह'
हम
अजनबी
की
तरह
अपने
ही
वतन
में
रहे
Majrooh Sultanpuri
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जाम
आँखों
से
पी
लिया
मैंने
जितना
जीना
था
जी
लिया
मैंने
Zeeshan kaavish
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बिन
कहे
छोड़
के
न
जाता
तो
अपनी
आँखों
से
कुछ
जताता
तो
कुछ
तो
मजबूरियाँ
रही
होंगी
पर
वो
मजबूरियाँ
बताता
तो
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Zeeshan kaavish
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मुस्कुराकर
गुज़र
गया
कोई
मुझपे
जादू
सा
कर
गया
कोई
पहले
तन्हाइयों
से
डरता
था
अब
ज़माने
से
डर
गया
कोई
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Zeeshan kaavish
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ऐसी
हालत
नहीं
हुई
होती
गर
मुहब्बत
नहीं
हुई
होती
ज़िंदगी
किस
तरह
बसर
करते
तेरी
चाहत
नहीं
हुई
होती
हम
दीवानों
पे
वो
ही
हँसता
है
जिसको
उल्फ़त
नहीं
हुई
होती
रफ़्ता
रफ़्ता
तुझे
भुलाते
अगर
तेरी
आदत
नहीं
हुई
होती
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Zeeshan kaavish
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सच
मान
जैसा
चाहा
था
वैसा
नहीं
मिला
कोई
भी
इस
जहान
में
तुझ
सेा
नहीं
मिला
Zeeshan kaavish
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