kitne aazaar muqaddar se lage rahte hain | कितने आज़ार मुक़द्दर से लगे रहते हैं

  - Yahya Khan Yusuf Zai
कितनेआज़ारमुक़द्दरसेलगेरहतेहैं
तेरेबीमारतोबिस्तरसेलगेरहतेहैं
कभीतुझबाला-नशींकोभीख़बरपहुँचेगी
कितनेसरहैंजोतिरेदरसेलगेरहतेहैं
शामहोतीहैतोकामऔरभीबढ़जाताहै
अन-गिनतयादोंकेदफ़्तरसेलगेरहतेहैं
तेरीफ़ुर्क़तमेंकिसेजादा-ओ-मंज़िलकादिमाग़
ग़मकेमारेकिसीपत्थरसेलगेरहतेहैं
हमभुलादेंगेज़मानेकाचलनभीलेकिन
शीशा-ए-दिलपेजोपत्थरसेलगेरहतेहैं
आजभीकूचा-ए-जानाँकीवहीरौनक़है
अबभीकुछलोगबराबरसेलगेरहतेहैं
  - Yahya Khan Yusuf Zai
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