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Manish Kumar Gupta
ashk aankhoñ men la nahin sakte
ashk aankhoñ men la nahin sakte | अश्क आँखों में ला नहीं सकते
- Manish Kumar Gupta
अश्क
आँखों
में
ला
नहीं
सकते
ज़ख़्म
तुम
को
दिखा
नहीं
सकते
दर्द
इतना
मिला
मोहब्बत
में
यार
अब
दिल
लगा
नहीं
सकते
- Manish Kumar Gupta
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आँसू
हो
तेरे
पास
तो
तू
भी
ख़रीद
ला
ग़म
की
दुकाँ
में
बिकती
है
ख़ुशियाँ
बड़ी
बड़ी
SHIV SAFAR
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अल्लाह
बना
दे
मिरे
अश्कों
को
कबूतर
सब
पूछ
रहे
हैं
तिरे
रूमाल
में
क्या
है
Khan Janbaz
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अश्क
माँ
के
जो
ख़ुशी
से
गिरे
तो
हैं
मोती
और
छलके
जो
ग़मों
से
तो
लहू
हो
जाए
S M Afzal Imam
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इस
बार
अश्क
कर
चुके
क़ीमत
अदायगी
इस
बार
तेरा
जाना
भी
ज़ाया'
नहीं
लगा
Aqib khan
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गर्म
आँसू
और
ठंडी
आहें
मन
में
क्या
क्या
मौसम
हैं
इस
बग़िया
के
भेद
न
खोलो
सैर
करो
ख़ामोश
रहो
Ibn E Insha
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आँसू
पोंछ
के
हँस
देता
है
आग
में
आग
लगाने
वाला
Arzoo Lakhnavi
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दुख
तो
बहुत
मिले
हैं
मोहब्बत
नहीं
मिली
यानी
कि
जिस्म
मिल
गया
औरत
नहीं
मिली
मुझको
पिता
की
आँख
के
आँसू
तो
मिल
गए
मुझको
पिता
से
ज़ब्त
की
आदत
नहीं
मिली
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Abhishar Geeta Shukla
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वक़्त,
वफ़ा,
हक़,
आँसू,
शिकवे
जाने
क्या
क्या
माँग
रहे
थे
एक
सहूलत
के
रिश्ते
से
हम
ही
ज़्यादा
माँग
रहे
थे
उसकी
आँखें
उसकी
बातें
उसके
लब
वो
चेहरा
उसका
हम
उसकी
हर
एक
अदास
अपना
हिस्सा
माँग
रहे
थे
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Shikha Pachouly
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सीधा-साधा
डाकिया
जादू
करे
महान
एक
ही
थैले
में
भरे
आँसू
और
मुस्कान
Nida Fazli
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रूमाल
ले
लिया
है
किसी
माह-जबीन
से
कब
तक
पसीना
पोंछते
हम
आस्तीन
से
ये
आँसुओं
के
दाग़
हैं,
आँसू
ही
धोएँगे
ये
दाग़
धुल
न
पाएँगे
वाशिंग
मशीन
से
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Waseem Nadir
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दिल
लग
गया
है
मेरा
फिर
इक
लड़की
से
बातों
से
वो
तेरी
सहेली
लगती
है
Manish Kumar Gupta
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ख़ुदा
हिस्सों
में
किसने
बाँटी
ज़मीं
तू
महदूद
कर
दे
सरकती
ज़मीं
ज़मीं
इश्क़
करती
है
महताब
से
अमावस
की
शब
में
तड़पती
ज़मीं
कभी
चाँद
मिलने
को
आता
है
पास
कभी
चाँद
के
पास
जाती
ज़मीं
नहीं
सोचता
कोई
उनके
लिए
किसानों
को
बहला
के
लूटी
ज़मीं
बहुत
ऊँची
है
ये
इमारत
सुनो
खड़ी
है
जहाँ
पे
है
किसकी
ज़मीं
ज़मीं
दिल
की
जबसे
हुई
रेगज़ार
बहारों
के
बिन
अब
मचलती
ज़मीं
सनम
बेवफ़ाई
का
है
ये
सबब
हिला
दी
है
तुमने
तो
मेरी
ज़मीं
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Manish Kumar Gupta
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अभी
तो
मरहले
हैं
और
बाक़ी
ग़मो
के
हैं
अभी
तो
दौर
बाक़ी
सताना
है
अभी
तो
और
तुझको
अभी
तो
ज़ीस्त
के
हैं
जौर
बाक़ी
ख़बर
तुझको
नहीं,
तेरी
हुई
क्या
तुझी
को
कर
रहे
हैं
ग़ौर
बाक़ी
रिवाजों
रस्मों
में
जकड़ा
हुआ
हूँ
बता
अब
कौन
से
हैं
तौर
बाक़ी
भला
कैसे
मिटाऊँ
भूख
अपनी
नहीं
हैं
पास
मेरे
कौर
बाक़ी
नहीं
बाक़ी
बची
हैं
गर्म
साँसे
घड़ी-भर
भी
नहीं
है
फ़ौर
बाक़ी
छुपा
फिरता
रहा
हूँ
मुद्दतों
से
कहाँ
जाऊँ,
नहीं
है
ठौर
बाक़ी
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Manish Kumar Gupta
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गया
हार
मैं
ज़ीस्त
के
ताश
में
थे
पत्ते
बड़े
पर
न
था
तजरिबा
Manish Kumar Gupta
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तेरी
दुनिया
से
कैसे
दूर
जाऊँ
मुहब्बत
रास्ते
में
पड़
रही
है
Manish Kumar Gupta
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