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Manish Kumar Gupta
chaand taaron ko kyun khale tanhaa
chaand taaron ko kyun khale tanhaa | चाँद तारों को क्यूँँ खले तन्हा
- Manish Kumar Gupta
चाँद
तारों
को
क्यूँँ
खले
तन्हा
हम
भी
इस
आसमाँ
तले
तन्हा
दिन
तो
मसरूफ़
हो
गया
मेरा
हिज्र
की
शब
न
पर
ढले
तन्हा
आह
निकली
न,
दर्द
पी
डाले
आँख
में
ग़म
तेरे
मले
तन्हा
मंज़िलों
से
नहीं
है
बैर
मुझे
जी
दुखाते
हैं
फ़ासले
तन्हा
बेख़ुदी
इस
क़दर
बढ़ी
अपनी
रो
दिए
ख़ुद
के
लग
गले
तन्हा
अक्स
अपना
'मनीष'
झूठा
था
तोड़
आईना,
हम
भले
तन्हा
- Manish Kumar Gupta
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महीनों
तक
रहा
करते
थे
सब
मेहमान
आँखों
में,
मगर
अब
ख़्वाब
भी
आते
नहीं
वीरान
आँखों
में
ज़मान
ए
हिज्र
कहने
को
रिवाज़
ए
इश्क़
ही
तो
है,
मगर
क्या
क्या
नहीं
होता
है
इस
दौरान
आँखों
में
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Darpan
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मोहब्बत
दो-क़दम
पर
थक
गई
थी
मगर
ये
हिज्र
कितना
चल
रहा
है
Zubair Ali Tabish
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ये
जो
हिजरत
के
मारे
हुए
हैं
यहाँ
अगले
मिसरे
पे
रो
के
कहेंगे
कि
हाँ
Ali Zaryoun
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हिज्र
में
ख़ुद
को
तसल्ली
दी
कहा
कुछ
भी
नहीं
दिल
मगर
हँसने
लगा
आया
बड़ा
कुछ
भी
नहीं
Afkar Alvi
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कोई
समुंदर,
कोई
नदी
होती
कोई
दरिया
होता
हम
जितने
प्यासे
थे
हमारा
एक
गिलास
से
क्या
होता
ताने
देने
से
और
हम
पे
शक
करने
से
बेहतर
था
गले
लगा
के
तुमने
हिजरत
का
दुख
बाट
लिया
होता
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Tehzeeb Hafi
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हिज्र
की
रातें
इतनी
भारी
होती
हैं
जैसे
छाती
पर
ऐरावत
बैठा
हो
Tanoj Dadhich
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तू
परिंदा
है
किसी
शाख़
को
घर
कर
लेगा
जो
तेरे
हिज्र
का
मारा
है
किधर
जाएगा
Shadab Javed
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'हर्ष'
वस्ल
में
जितनी
मर्ज़ी
शे'र
कह
लो
तुम
हिज्र
के
बिना
इन
में
जान
आ
नहीं
सकती
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Harsh saxena
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तड़पना
हिज्र
तक
सीमित
नहीं
है
उसे
दुल्हन
भी
बनते
देखना
है
Anand Verma
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इस
से
पहले
कि
ज़मीं-ज़ाद
शरारत
कर
जाएँ
हम
सितारों
ने
ये
सोचा
है
कि
हिजरत
कर
जाएँ
दौलत-ए-ख़्वाब
हमारे
जो
किसी
काम
न
आई
अब
किसी
को
नहीं
मिलने
की
वसिय्यत
कर
जाएँ
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Idris Babar
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कोई
साया
नज़र
नहीं
आता
कोई
मेरा
नज़र
नहीं
आता
झाँकता
हूँ
मैं
झील
में
तो
मुझे
अक्स
ख़ुद
का
नज़र
नहीं
आता
शह्र
कोहसार
से
भरा
था
ये
अब
तो
ज़र्रा
नज़र
नहीं
आता
मैं
ग़ज़ल
लिक्खूँ
तो
भला
कैसे
कोई
सफ़्हा
नज़र
नहीं
आता
सब
ही
तन्हा
जिसे
समझते
हैं
वो
तो
तन्हा
नज़र
नहीं
आता
ग़ालिबन
बादलों
में
छुप
गया
है
शम्स
उगता
नज़र
नहीं
आता
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Manish Kumar Gupta
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तेरी
दुनिया
से
कैसे
दूर
जाऊँ
मुहब्बत
रास्ते
में
पड़
रही
है
Manish Kumar Gupta
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गया
हार
मैं
ज़ीस्त
के
ताश
में
थे
पत्ते
बड़े
पर
न
था
तजरिबा
Manish Kumar Gupta
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उसकी
हम
पर
ये
मेहरबानी
देख
जिस्म
में
ख़ून
है
न
पानी
देख
ग़म
ने
पीछा
न
आज
तक
छोड़ा
है
यही
मुझ
में
जावेदानी
देख
ख़्वाब
मेरा
है
आई
पी
एस
का
तू
भी
इक
ख़्वाब
आसमानी
देख
एक
तितली
ने
गुल
को
सोख
लिया
हाए
भँवरे
की
पासबानी
देख
इस
सेे
पहले
मैं
अर्ज़-ए-हाल
करूँँ
देख
मेरी
ये
ना-तवानी
देख
मर
गए
कितने
आ
के
चक्कर
में
हम-ज़बानों
की
हम-ज़बानी
देख
कौन
तश्बीह
जा
के
दे
उसको
जब
नहीं
कोई
उसका
सानी
देख
कैसे
लाऊँ
मैं
जीने
का
जज़्बा
साथ
देती
न
ज़िंदगानी
देख
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Manish Kumar Gupta
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तुझ
सेे
मेरी
हर
ख़ुशी
है
ज़ीस्त
की
तू
रौशनी
है
तुम
डराओ
मत
क़ज़ा
से
हर
तरफ़
ही
ज़िन्दगी
है
हो
रहा
है
जिस्म
बेजान
रूह
में
अफ़सुर्दगी
है
है
नहीं
कोई
किसी
का
छाई
मुझ
में
बेख़ुदी
है
वस्ल
की
आई
है
शब
आज
दिल
में
मेरे
खलबली
है
क्यूँ
की
तुमने
बेवफ़ाई
आह
इक
दिल
में
दबी
है
कुछ
अलग
है
शौक़
मेरा
ग़ज़लों
से
ही
बंदगी
है
ख़ून
से
लिक्खी
थी
मैंने
जो
ग़ज़ल
तुमने
सुनी
है
मैं
नशा
करता
नहीं
हूँ
फिर
भी
रहती
रिंदगी
है
मौत
के
मरकज़
में
था
मैं
तुम
मिले
तो
ज़िन्दगी
है
कुछ
सही
पहले
नहीं
था
अब
ग़लत
लगता
सही
है
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Manish Kumar Gupta
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