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Vivek Chaturvedi
vo log sab ke sab hamaare log hain
vo log sab ke sab hamaare log hain | वो लोग सब के सब हमारे लोग हैं
- Vivek Chaturvedi
वो
लोग
सब
के
सब
हमारे
लोग
हैं
जो
भी
मोहब्बत
के
ही
मारे
लोग
हैं
हम
अपने
जानिब
से
अकेले
हैं
मगर
दुश्मन
के
जानिब
भी
हमारे
लोग
हैं
काफ़ी
हैं
आँखें
ये
किसी
के
क़त्ल
को
ये
लोग
हाए
कितने
प्यारे
लोग
हैं
हैरत
है
प्यासे
कैसे
रह
जाते
हैं
वो
जो
भी
समुंदर
के
किनारे
लोग
हैं
- Vivek Chaturvedi
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साथ
चलते
जा
रहे
हैं
पास
आ
सकते
नहीं
इक
नदी
के
दो
किनारों
को
मिला
सकते
नहीं
उसकी
भी
मजबूरियाँ
हैं
मेरी
भी
मजबूरियाँ
रोज़
मिलते
हैं
मगर
घर
में
बता
सकते
नहीं
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Bashir Badr
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तुझे
भूल
जाने
की
कोशिशें
कभी
कामयाब
न
हो
सकीं
तिरी
याद
शाख़-ए-गुलाब
है
जो
हवा
चली
तो
लचक
गई
Bashir Badr
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ईद
पर
सब
फूल
लेकर
आ
रहे
हैं
हो
गए
हैं
ज़िंदगी
के
ख़त्म
रमज़ान
Aves Sayyad
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ये
जिस्म
तंग
है
सीने
में
भी
लहू
कम
है
दिल
अब
वो
फूल
है
जिस
में
कि
रंग-ओ-बू
कम
है
Pallav Mishra
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किसी
कली
किसी
गुल
में
किसी
चमन
में
नहीं
वो
रंग
है
ही
नहीं
जो
तिरे
बदन
में
नहीं
Farhat Ehsaas
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चल
दिए
घर
से
तो
घर
नहीं
देखा
करते
जाने
वाले
कभी
मुड़
कर
नहीं
देखा
करते
सीपियां
कौन
किनारे
से
उठा
कर
भागा
ऐसी
बाते
समुंदर
नहीं
देखा
करते
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Unknown
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हज़ारों
साल
नर्गिस
अपनी
बे-नूरी
पे
रोती
है
बड़ी
मुश्किल
से
होता
है
चमन
में
दीदा-वर
पैदा
Allama Iqbal
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न
रूई
हो
तो
अपने
अश्कों
से
बाती
बनाएँगे
बुझा
दीया
हमारा
तो
हवा
से
लड़
भी
जाएँगे
बनाई
रोज़
चौदह
साल
रंगोली
बस
इस
ख़ातिर
न
जाने
रामजी
वनवास
से
कब
लौट
आएंँगे
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Krishnakant Kabk
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नदी
को
कोसते
हैं
सब
किसी
के
डूब
जाने
पर
नदी
में
डूबते
को
पर
कोई
तिनका
नहीं
देता
Alankrat Srivastava
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हाथ
काँटों
से
कर
लिए
ज़ख़्मी
फूल
बालों
में
इक
सजाने
को
Ada Jafarey
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हो
गर
बराबरी
में
आना
तो
बढ़ा
कद
तू
ये
लोग,
छोटा
हो
कद
तो
गले
नहीं
लगते
Vivek Chaturvedi
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हम
रह
गए
पीछे
उम्र
भर
उन
सेे
भी
जो
दौड़
में
आगे
नहीं
हो
सकते
थे
Vivek Chaturvedi
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अभी
दूर
हैं
जितने
ही
पास
थे
हम
कि
दुश्मन
हैं
अब
जो
कभी
ख़ास
थे
हम
रखा
दूर
हमने
उसे
अपने
दिल
से
उसे
भी
तो
आते
कहाँ
रास
थे
हम
दिखाकर
ये
तस्वीर
इक
दिन
कहेंगें
ये
है
दोस्त
मेरा
यहीं
पास
थे
हम
अलग
पहले
उसने
रखा
सब
सेे
मुझको
मुझे
फिर
उसी
ने
कहा
ख़ास
थे
हम
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Vivek Chaturvedi
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कितनें
शिद्दतों
से
अपने
फ़र्ज
को
निभाता
है
आईना
जितना
तोड़ते
हैं
उतने
चेहरे
,दिखाता
है
आईना
Vivek Chaturvedi
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इश्क़
की
राहों
में
गुज़र
के
देखते
हैं
इक
दफ़ा
हम
उनपे
मर
के
देखते
हैं
मैं
बुरा
हूँ
और
दुनिया
कितनी
अच्छी
ये
भी
तो
अब
हम
सुधर
के
देखते
हैं
देखा
था
हमनें
दफ़ा
इक
आँख
भर
के
तब
से
उन्हें
आँख
भर
के
देखते
हैं
वो
बिछाती
है
मेरे
रस्तों
में
पलकें
अपने
रस्तों
में
गुज़र
के
देखतें
हैं
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Vivek Chaturvedi
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