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Vikram Sharma
jinse uthata nahin kali ka bojh
jinse uthata nahin kali ka bojh | जिनसे उठता नहीं कली का बोझ
- Vikram Sharma
जिनसे
उठता
नहीं
कली
का
बोझ
उनके
कंधों
पे
ज़िन्दगी
का
बोझ
वक़्त
जब
हाथ
में
नहीं
रहता
किसलिए
हाथ
पर
घड़ी
का
बोझ
ब्याह
के
वक़्त
की
कोई
फ़ोटो
गहनों
के
बोझ
पर
हँसी
का
बोझ
सर
पे
यादों
की
टोकरी
रख
ली
कम
न
होने
दिया
कमी
का
बोझ
- Vikram Sharma
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गर
अदीबों
को
अना
का
रोग
लग
जाए
तो
फिर
गुल
मोहब्बत
के
अदब
की
शाख़
पर
खिलते
नहीं
Afzal Ali Afzal
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तुम्हारे
बाद
इस
आँगन
में
फूल
खिलने
पर
ख़ुशी
हुई
भी
तो
ये
दुख
हुआ
कि
दें
किसको
Mohit Dixit
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वो
मिरी
बाहों
में
बे-फ़िक्र
मुलव्विस
हुई
है
कब्र
पे
हार
कोई
फूलों
का
रक्खा
हुआ
है
Raj
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आप
अपने
से
हम-सुख़न
रहना
हमनशीं
साँस
फूल
जाती
है
Jaun Elia
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वैसे
तो
ज़ेवरों
की
ज़रूरत
नहीं
तुझे
फिर
भी
अगर
ये
फूल
तेरे
काम
आ
सके
Charagh Sharma
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फूल
से
लेकर
ये
धनिया
लाने
तक
के
इस
सफ़र
को
मुझको
तेरे
साथ
ही
तय
करने
की
ख़्वाहिश
है
पगली
Harsh saxena
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हज़ार
बर्क़
गिरे
लाख
आँधियाँ
उट्ठें
वो
फूल
खिल
के
रहेंगे
जो
खिलने
वाले
हैं
Sahir Ludhianvi
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काँटों
में
घिरे
फूल
को
चूम
आएगी
लेकिन
तितली
के
परों
को
कभी
छिलते
नहीं
देखा
Parveen Shakir
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दूर
इक
सितारा
है
और
वो
हमारा
है
आँख
तक
नहीं
लगती
कोई
इतना
प्यारा
है
छू
के
देखना
उसको
क्या
अजब
नज़ारा
है
तीर
आते
रहते
थे
फूल
किसने
मारा
है
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Kafeel Rana
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है
समझना
आपको
तो
शे'र
से
इज़हार
समझें
बात
कहने
को
भला
हम
फूल
क्यूँ
तोड़ा
करेंगे
Ankit Maurya
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ग़मों
की
सूई
में
यादें
पिरोकर
उदासी
ने
बुना
है
मेरा
स्वेटर
किसी
तन्हाई
का
बेताल
मुझ
सेे
है
लिपटा
नाम
के
धोके
में
आकर
तेरे
जज़्बों
को
लफ़्ज़ों
का
फ़लक
दे
क़फ़स
से
इन
परिंदों
को
रिहा
कर
ज़ियादा
वज़्न
है
टूटे
न
कश्ती
बचा
ले
ख़ुद
को
तू
मुझको
गिराकर
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Vikram Sharma
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मिरी
आदत
है
मैं
हर
राहबर
से
बात
करता
हूँ
गुज़रता
हूँ
जो
रस्ते
से
शजर
से
बात
करता
हूँ
मैं
तुझ
सेे
बात
करने
को
तिरे
किरदार
में
आकर
इधर
से
फ़ोन
करता
हूँ
उधर
से
बात
करता
हूँ
मैं
तेरे
साथ
तो
घर
में
बड़ा
ख़ामोश
रहता
था
नहीं
मौजूद
तू
घर
में
तो
घर
से
बात
करता
हूँ
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Vikram Sharma
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एक
ख़ामोशी
ने
सदा
पाई
ढाई
हर्फ़ों
में
फिर
वो
हकलाई
चार
दीवार
चंद
छिपकलियाँ
हिज्र
की
रात
के
तमाशाई
डूबने
का
उसे
मलाल
नहीं
जिसने
देखी
नदी
की
रा'नाई
आख़िरी
ट्रेन
थी
तिरी
जानिब
जो
ग़लत
प्लेटफॉर्म
पर
आई
बारिशों
ने
हमें
उदास
किया
सील
दीवार
में
उतर
आई
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Vikram Sharma
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आपको
लगता
रहे
हिज्र
भलाई
का
सबब
दिल
किसी
तौर
न
समझेगा
जुदाई
का
सबब
और
क्या
चाहता
है
तुम
सेे
मुहब्बत
का
असीर
जानना
चाहता
है
अपनी
रिहाई
का
सबब
देर
से
चुप
पड़े
दरिया
ने
नमक
फेंका
है
पूछता
होगा
मेरी
आबला-पाई
का
सबब
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Vikram Sharma
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दश्त
में
यार
को
पुकारा
जाए
क़ैस
साहब
का
रूप
धारा
जाए
मुझ
को
डर
है
कि
पिंजरा
खुलने
पर
ये
परिंदा
कहीं
न
मारा
जाए
दिल
उसे
याद
कर
सदा
मत
दे
कौन
आता
है
जब
पुकारा
जाए
दिल
की
तस्वीर
अब
मुकम्मल
हो
उन
की
जानिब
से
तीर
मारा
जाए
लाश
मौजों
को
हुक्म
देती
है
ले
चलो
जिस
तरफ़
किनारा
जाए
दिल
तो
है
ही
नहीं
हमारा
फिर
टूट
जाए
तो
क्या
हमारा
जाए
ये
तिरा
काम
है
नए
महबूब
डूबते
शख़्स
को
उभारा
जाए
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Vikram Sharma
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