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Kavi Vikash Shukla
koi sapne dikhaane nahin hain ha
koi sapne dikhaane nahin hain ha | कोई सपने दिखाने नहीं हैं हमें
- Kavi Vikash Shukla
कोई
सपने
दिखाने
नहीं
हैं
हमें
ज़ख्में
दिल
भी
मिटाने
नहीं
हैं
हमें
जो
अना
दाव
पर
रख
निभाने
पड़े
ऐसे
रिश्ते
निभाने
नहीं
हैं
हमें
- Kavi Vikash Shukla
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होश
वालों
को
ख़बर
क्या
बे-ख़ुदी
क्या
चीज़
है
इश्क़
कीजे
फिर
समझिए
ज़िंदगी
क्या
चीज़
है
Nida Fazli
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हर
किसी
से
ही
मुहब्बत
माँगता
है
दिल
तो
अब
सब
सेे
अक़ीदत
माँगता
है
सीख
आया
है
सलीक़ा
ग़ुफ़्तगू
का
मुझ
सेे
मेरा
दोस्त
इज़्ज़त
माँगता
है
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मोहब्बत
नेक-ओ-बद
को
सोचने
दे
ग़ैर-मुमकिन
है
बढ़ी
जब
बे-ख़ुदी
फिर
कौन
डरता
है
गुनाहों
से
Arzoo Lakhnavi
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ये
नदी
वर्ना
तो
कब
की
पार
थी
मेरे
रस्ते
में
अना
दीवार
थी
आप
को
क्या
इल्म
है
इस
बात
का
ज़िंदगी
मुश्किल
नहीं
दुश्वार
थी
थीं
कमानें
दुश्मनों
के
हाथ
में
और
मेरे
हाथ
में
तलवार
थी
जल
गए
इक
रोज़
सूरज
से
चराग़
रौशनी
को
रौशनी
दरकार
थी
आज
दुनिया
के
लबों
पर
मुहर
है
कल
तलक
हाँ
साहब-ए-गुफ़्तार
थी
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ARahman Ansari
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अना
को
अपनी
समझाना
पड़ेगा
बुलाती
है,
तो
फिर
जाना
पड़ेगा
Salman Zafar
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सुन
ओ
कहानीकार
कोई
ऐसा
रोल
दे
ऐसे
अदा
करूँं
मेरी
इज़्ज़त
बनी
रहे
Afzal Ali Afzal
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ज़िंदा
रहने
की
ये
तरक़ीब
निकाली
हमने
बात
बिगड़ी
हुई
कुछ
ऐसे
सँभाली
हमने
उस
सेे
समझौता
किया
है
उसी
की
शर्तों
पे
जान
भी
बच
गई
इज़्ज़त
भी
बचा
ली
हमने
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Divyansh Shukla
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बे-ख़ुदी
बे-सबब
नहीं
'ग़ालिब'
कुछ
तो
है
जिस
की
पर्दा-दारी
है
Mirza Ghalib
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ऐ
"दाग़"
बुरा
मान
ना
तू
उसके
कहे
का
माशूक
की
गाली
से
तो
इज़्ज़त
नहीं
जाती
Dagh Dehlvi
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उधारी
सर
से
ऊपर
बढ़
चुकी
है
हमारी
जान
जोखिम
में
पड़ी
है
हमीं
अपमान
सहकर
जी
रहे
हैं
अना
की
लाश
पंखे
पर
मिली
है
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Vikas Sahaj
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जो
कुछ
करने
निकले
हैं
कर
जाएँगे
हम
जुगनू
अंधियारों
से
डर
जाएँगे?
तेरी
सूरत
भी
अब
मुझको
याद
नहीं
क्या
सोचा
था
बिन
तेरे
मर
जाएँगे?
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Kavi Vikash Shukla
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ज़ख़्म
नासूर
थे
सिल
नहीं
पाए
हम
फूल
पतझड़
के
थे
खिल
नहीं
पाए
हम
तुम
हर
इक
बात
में
हम
सेे
बेहतर
रहे
इसलिए
भी
तो
बस
मिल
नहीं
पाए
हम
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Kavi Vikash Shukla
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हर
दिन
तेरा
रास्ता
देखा
जाएगा
जो
कुछ
कहेगी
दुनिया
देखा
जाएगा
इश्क़
है
तुम
सेे
बस
इतना
कह
लेने
दो
फिर
जो
कुछ
भी
होगा
देखा
जाएगा
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Kavi Vikash Shukla
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है
कठिन
राह
तुम
इस
पे
चलना
नहीं
चाँद
होना
मगर
सुब्ह
ढलना
नहीं
हर
गुलाब
एक
दिन
यूँँ
तो
मुरझाएगा
तुम
मगर
यूँँ
फजा
संग
बदलना
नहीं
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Kavi Vikash Shukla
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हर
इक
दर्द
को
हँसकर
सहना
पड़ता
है
या
फिर
ज़ख़्म
छुपाकर
रहना
पड़ता
है
वो
जब
हँसकर
पूछता
है
यूँँ
हाल
मेरा
मुझको
सब
कुछ
अच्छा
कहना
पड़ता
है
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Kavi Vikash Shukla
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