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Vibhat kumar
ek bajte hain
ek bajte hain | एक बजते हैं
- Vibhat kumar
एक
बजते
हैं
रात
के
एक
बजते
हैं
ख़ुदा
का
नाम
रटते
हैं
बीमार
के
सांस
नहीं
आ
रही
कोई
भी
आस
नहीं
आ
रही
फोन
पर
आवाज़
नहीं
आ
रही
मौत
पर
आज
नहीं
आ
रही
इस
अफरातफरी
के
आलम
में
इस
ख़ामोशी
से
लिपटे
ग़म
में
नींद
नहीं
है,
रोते
हैं
रात
के
एक
बजते
हैं
साय
साय
हवा
की
धुन
सन्नाटा
और
अधेड़बुन
न
जाने
क्या
होता
होगा
शायद
वो
चैन
से
सोता
होगा
बस
यही
सच
हो
और
सब
हो
झूठ
ऐ
मेरे
रब!
तू
मत
रूठ
इस
रात
की
सुब्ह
भी
आएगी
सोने
की
वजह
भी
आएगी
अभी
बस
बेचैन
हैं,
जगते
हैं
रात
के
एक
बजते
हैं
- Vibhat kumar
जहाँ
इंसानियत
वहशत
के
हाथों
ज़ब्ह
होती
हो
जहाँ
तज़लील
है
जीना
वहाँ
बेहतर
है
मर
जाना
Gulzar Dehlvi
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तुम्हारे
साथ
था
तो
मैं
गम-ए-उल्फ़त
में
उलझा
था
तुम्हें
छोड़ा
तो
ये
जाना
कि
दुनिया
ख़ूब-सूरत
है
Nirbhay Nishchhal
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जहाँ
से
जी
न
लगे
तुम
वहीं
बिछड़
जाना
मगर
ख़ुदा
के
लिए
बे-वफ़ाई
न
करना
Munawwar Rana
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जहाँ
जो
था
वहीं
रहना
था
उस
को
मगर
ये
लोग
हिजरत
कर
रहे
हैं
Liaqat Jafri
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इस
दौर
के
मर्दों
की
जो
की
शक्ल-शुमारी
साबित
हुआ
दुनिया
में
ख़्वातीन
बहुत
हैं
Sarfaraz Shahid
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लगा
जब
कि
दुनिया
की
पहली
ज़रूरत
मोहब्बत
है
तब
उसने
माना
यक़ीं
हो
गया
जब
मोहब्बत
ज़रूरत
है
तब
उसने
माना
वगरना
तो
ये
लोग
उसे
ख़ुद-कुशी
के
लिए
कह
चुके
थे
उसे
आइने
ने
बताया
कि
वो
ख़ूब-सूरत
है
तब
उसने
माना
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Vikram Gaur Vairagi
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जहाँ
तक
आके
तुम
वापस
गए
हो
वहाँ
अब
तक
कोई
पहुँचा
नहीं
है
Zubair Ali Tabish
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कल
जहाँ
दीवार
थी
है
आज
इक
दर
देखिए
क्या
समाई
थी
भला
दीवाने
के
सर
देखिए
Javed Akhtar
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ये
कब
कहती
हूँ
तुम
मेरे
गले
का
हार
हो
जाओ
वहीं
से
लौट
जाना
तुम
जहाँ
बेज़ार
हो
जाओ
Parveen Shakir
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ये
नदी
वर्ना
तो
कब
की
पार
थी
मेरे
रस्ते
में
अना
दीवार
थी
आप
को
क्या
इल्म
है
इस
बात
का
ज़िंदगी
मुश्किल
नहीं
दुश्वार
थी
थीं
कमानें
दुश्मनों
के
हाथ
में
और
मेरे
हाथ
में
तलवार
थी
जल
गए
इक
रोज़
सूरज
से
चराग़
रौशनी
को
रौशनी
दरकार
थी
आज
दुनिया
के
लबों
पर
मुहर
है
कल
तलक
हाँ
साहब-ए-गुफ़्तार
थी
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ARahman Ansari
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