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Vedic Dwivedi
subh kahti hai na baitho haar kar tum
subh kahti hai na baitho haar kar tum | सुब्ह कहती है न बैठो हार कर तुम
- Vedic Dwivedi
सुब्ह
कहती
है
न
बैठो
हार
कर
तुम
था
बुरा
दिन
आज
कल
अच्छा
मिलेगा
- Vedic Dwivedi
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दोनों
जहान
तेरी
मोहब्बत
में
हार
के
वो
जा
रहा
है
कोई
शब-ए-ग़म
गुज़ार
के
Faiz Ahmad Faiz
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वो
जंग
जिस
में
मुक़ाबिल
रहे
ज़मीर
मिरा
मुझे
वो
जीत
भी
'अंबर'
न
होगी
हार
से
कम
Ambreen Haseeb Ambar
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मैं
सच
कहूँगी
मगर
फिर
भी
हार
जाऊँगी
वो
झूट
बोलेगा
और
ला-जवाब
कर
देगा
Parveen Shakir
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हमें
ये
जिस
तरह
से
ख़्याल
तेरा
खेंच
लेता
है
लगा
ले
शर्त,
तुझ
सेे
ग्रैविटी
ने
हार
जाना
है
Nawaaz
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ये
कब
कहती
हूँ
तुम
मेरे
गले
का
हार
हो
जाओ
वहीं
से
लौट
जाना
तुम
जहाँ
बेज़ार
हो
जाओ
Parveen Shakir
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न
करो
बहस
हार
जाओगी
हुस्न
इतनी
बड़ी
दलील
नहीं
Jaun Elia
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हर
तरफ़
उग
आए
हैं
जंगल
हमारी
हार
के
जीत
का
कोई
भी
रस्ता
अब
नहीं
दिखता
हमें
Siddharth Saaz
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शरीफ़
इंसान
आख़िर
क्यूँ
इलेक्शन
हार
जाता
है
किताबों
में
तो
ये
लिक्खा
था
रावन
हार
जाता
है
Munawwar Rana
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तू
मोहब्बत
से
कोई
चाल
तो
चल
हार
जाने
का
हौसला
है
मुझे
Ahmad Faraz
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मेरे
तोहफ़ों
ने
मोहब्बत
का
भरम
तोड़
दिया
चूड़ियाँ
तंग
निकल
आई
हैं
और
हार
खुले
Ahmad Abdullah
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लगे
हो
तुम
भी
मुझको
आज़माने
में
कहूँ
अपना
किसे
मैं
अब
ज़माने
में
Vedic Dwivedi
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वतन
से
हर
किसी
को
इश्क़
होता
है
लिखे
वेदिक
वतन
पर
जाँ
लुटाते
चल
Vedic Dwivedi
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हक़ीक़त
उन्हें
जब
बताने
लगे
सभी
लोग
उठ
करके
जाने
लगे
बसाने
में
जिसको
ज़माना
लगा
मिरा
शहर
क्यूँँं
वो
जलाने
लगे
जिसे
घर
की
लक्ष्मी
बताया
गया
निलामी
उसी
की
कराने
लगे
थी
नफ़रत
दिलों
में
हमारे
लिए
मिरे
शव
पे
आँसू
बहाने
लगे
बुरे
वक़्त
में
काम
आए
नहीं
मुझे
अपने
भी
सब
बेगाने
लगे
हवा
में
घुला
ज़ह्र
क्या
ख़ुद
से
ही
घुला
है
ये
जब
कारखाने
लगे
था
मालूम
उनको
नहीं
क्या
है
ये
थे
भूखे
जो
माहुर
भी
खाने
लगे
लगा
टूटने
हौसला
जब
कभी
अज़ल
की
ग़ज़ल
गुनगुनाने
लगे
उजाले
में
"दीपक"
की
रातें
कटी
हुई
सुब्ह
उसको
बुझाने
लगे
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लौट
भी
आए
तो
हमको
क्या
मिलेगा
इश्क़
में
फिर
से
नया
वा'दा
मिलेगा
चिट्ठियाँ
फिर
से
चलन
में
आ
गईं
जो
हीर
को
फिर
से
वही
रांझा
मिलेगा
सुब्ह
कहती
है
न
बैठो
हार
कर
तुम
था
बुरा
दिन
आज
कल
अच्छा
मिलेगा
है
बरेली
और
तुम
ये
पूछते
हो
क्या
यहाँ
पर
कान
का
झुमका
मिलेगा
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लिखना
जो
हुआ
ख़ुद
को
इक
दिया
लिखूंगा
मैं
दिलरुबा
को
अपने
बहती
हवा
लिखूंगा
मैं
बे-चैन
हो
ख़त
पढ़
के
उसको
नींद
ना
आए
नाम
अपना
कोने
में
सर-फिरा
लिखूंगा
मैं
इश्क़
की
ग़ज़ल
मेरी
हो
गई
मुकम्मल
तो
ख़ुद
रदीफ़
बन
तुमको
क़ाफ़िया
लिखूंगा
मैं
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