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Vedic Dwivedi
lage ho tum bhi mujhko aazmaane men
lage ho tum bhi mujhko aazmaane men | लगे हो तुम भी मुझको आज़माने में
- Vedic Dwivedi
लगे
हो
तुम
भी
मुझको
आज़माने
में
कहूँ
अपना
किसे
मैं
अब
ज़माने
में
- Vedic Dwivedi
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तेरी
बातें
ग़ज़ल
में
हम
पिरोएंगे
मिले
फ़ुर्सत
लिपट
ख़ुद
से
ही
रोएंगे
सुना
कर
लोरियाँ
सबको
सुलाता
है
अजल
की
गोद
में
हम-तुम
भी
सोएंगे
समुंदर
आँख
में
जिसके
हो
सिमटा
उसे
बारिश
ग़मों
के
क्या
भिगोएंगे
बिछड़ना
इश्क़
में
मरने
ही
जैसा
है
समझ
आएगी
जब
अपने
को
खोएंगे
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हम
ग़लत
को
अगर
सही
कहते
तुमने
जो
कह
दिया
वही
कहते
साथ
थी
ग़म
में
वो
ख़ुशी
में
भी
है
ये
बेहतर
उसे
घड़ी
कहते
जल
गया
दूध
जो
कड़ाही
में
गांव
में
इसको
खुर्चुनी
कहते
नाम
पर
दंगे
मेरे
ना
होते
आप
भी
मुझको
आदमी
कहते
लौटकर
सालों
बाद
घर
आया
मां
न
हों
लोग
अजनबी
कहते
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बिछड़
कर
फिर
मिले
जो
हाल
पूछेंगे
मिरे
बिन
कैसे
गुज़रे
साल
पूछेंगे
नहीं
मुझ
सा
कोई
'आशिक़
ज़माने
में
मुझे
मालूम
है
फ़िलहाल
पूछेंगे
अदालत
में
है
ये
पेशा
वकीलों
का
सवालों
से
ही
हाल-ओ-चाल
पूछेंगे
यही
रस्ता
अगर
संसद
भवन
का
है
चलाएँ
कब-
तलक
हड़ताल
पूछेंगे
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चिट्ठियाँ
आज
होती
सम्मानित
फोन
बदनाम
अब
मुहब्बत
में
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लिखना
जो
हुआ
ख़ुद
को
इक
दिया
लिखूंगा
मैं
दिलरुबा
को
अपने
बहती
हवा
लिखूंगा
मैं
बे-चैन
हो
ख़त
पढ़
के
उसको
नींद
ना
आए
नाम
अपना
कोने
में
सर-फिरा
लिखूंगा
मैं
इश्क़
की
ग़ज़ल
मेरी
हो
गई
मुकम्मल
तो
ख़ुद
रदीफ़
बन
तुमको
क़ाफ़िया
लिखूंगा
मैं
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