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Usman Saifi
jism ko mere vo kuchh yuñ sataati hai
jism ko mere vo kuchh yuñ sataati hai | जिस्म को मेरे वो कुछ यूँँ सताती है
- Usman Saifi
जिस्म
को
मेरे
वो
कुछ
यूँँ
सताती
है
एक
नागिन
जो
मेरा
माँस
खाती
है
- Usman Saifi
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पिघल
रहा
है
दुपहरी
में
यूँँ
वो
मोम
बदन
कहाँ
कहाँ
से
न
गुजरेगा
पसीना
हाए
Vishnu virat
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जिस्म
चादर
सा
बिछ
गया
होगा
रूह
सिलवट
हटा
रही
होगी
Kumar Vishwas
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अब
सुलगती
है
हथेली
तो
ख़याल
आता
है
वो
बदन
सिर्फ़
निहारा
भी
तो
जा
सकता
था
Ameer Imam
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मैं
हिंदी
और
उर्दू
को
अलग
कैसे
करूँँ
यारों
अगर
साँसें
हटा
दूँ
तो
बदन
में
कुछ
नहीं
बचता
Umesh Maurya
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किसी
कली
किसी
गुल
में
किसी
चमन
में
नहीं
वो
रंग
है
ही
नहीं
जो
तिरे
बदन
में
नहीं
Farhat Ehsaas
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हम
उस
में
बैठ
के
करते
हैं
साधना
तेरी
हमारा
जिस्म
भी
भीतर
से
एक
शिवाला
है
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Irshad Khan Sikandar
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एक
मुद्दत
से
परिंदे
की
तरह
ये
क़ैद
है
रूह
मेरे
जिस्म
से
'क़ासिद'
रिहा
होती
नहीं
Gurbir Chhaebrra
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ये
गहरा
राज़
है
इसका
बदन
को
खा
ही
जाती
है
मोहब्बत
पाक
होकर
भी
हवस
तक
आ
ही
जाती
है
ALI ZUHRI
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फूलों
की
सेज
पर
ज़रा
आराम
क्या
किया
उस
गुल-बदन
पे
नक़्श
उठ
आए
गुलाब
के
Adil Mansuri
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सख़्त
सर्दी
में
ठिठुरती
है
बहुत
रूह
मिरी
जिस्म-ए-यार
आ
कि
बेचारी
को
सहारा
मिल
जाए
Farhat Ehsaas
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इस
उजड़े
हुए
घर
को
आबाद
तो
कर
ज़रा
सा
तू
इस
दिल
को
अब
शाद
तो
कर
मुहब्बत
में
अव्वल
तिरा
नाम
होगा
ज़रा
इस
परिंदे
को
आज़ाद
तो
कर
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Usman Saifi
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राह
में
तू
इश्क़
की
खोता
है
क्या
अब
बे-वफ़ा
के
धोखे
से
रोता
है
क्या
अब
ज़िन्दगी
में
हर-सू
ये
इक
शोर
क्यूँ
है
मरने
की
हालत
में
भी
सोता
है
क्या
अब
सब्ज़
होती
ही
नहीं
दिल
की
ज़मीं
भी
बीज
ख़्वाहिश
के
तू
ये
बोता
है
क्या
अब
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Usman Saifi
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हैं
उड़ते
रंग
भी
अब
उसके
जाने
से
महक
जाते
हैं
गुल
भी
उसके
आने
से
नहीं
है
कोई
उस
जैसा
ज़माने
में
सँवर
जाएगी
क़िस्मत
उसको
पाने
से
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Usman Saifi
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मुझे
तो
उसकी
तीखी
नज़रों
को
सहना
नहीं
आता
मगर
उसको
बिना
देखे
मुझे
रहना
नहीं
आता
मिरी
वो
जान
है
कैसे
कहूँ
उसको
मैं
हाल-ए-दिल
मुझे
उस
से
मोहब्बत
तो
है
पर
कहना
नहीं
आता
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Usman Saifi
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ज़हर
है
कुछ
भरा
इतना
निगाहों
में
देखती
है
मुझे
जब
भी
रुलाती
है
जिस्म
को
मेरे
वो
कुछ
यूँँ
सताती
है
एक
नागिन
जो
मेरा
माँस
खाती
है
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Usman Saifi
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