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Upendra Bajpai
aise aankhoñ ko uski mat dekho
aise aankhoñ ko uski mat dekho | ऐसे आँखों को उसकी मत देखो
- Upendra Bajpai
ऐसे
आँखों
को
उसकी
मत
देखो
तैरना
सीख
लो
मियाँ
पहले
- Upendra Bajpai
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अशआ'र
मिरे
यूँँ
तो
ज़माने
के
लिए
हैं
कुछ
शे'र
फ़क़त
उन
को
सुनाने
के
लिए
हैं
ये
इल्म
का
सौदा
ये
रिसाले
ये
किताबें
इक
शख़्स
की
यादों
को
भुलाने
के
लिए
हैं
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Jaan Nisar Akhtar
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कल
मेरी
एक
प्यारी
सहेली
किताब
में
इक
ख़त
छुपा
रही
थी
कि
तुम
याद
आ
गए
Anjum Rehbar
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उसने
पूछा
था
पहले
हाल
मेरा
फिर
किया
देर
तक
मलाल
मेरा
मैं
वफ़ा
को
हुनर
समझता
था
मुझपे
भारी
पड़ा
कमाल
मेरा
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Subhan Asad
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हमारा
इल्म
बूढ़ा
हो
रहा
है
किताबें
धूल
खाती
जा
रही
हैं
Kaif Uddin Khan
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किताबें
बंद
करके
जब
मैं
बिस्तर
पर
पहुँचता
हूँ
तुम्हारी
याद
भी
आकर
बगल
में
लेट
जाती
है
Bhaskar Shukla
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दवाओं
की
रसीदें
देख
ली
थीं
किताबें
इसलिए
माँगी
नहीं
हैं
Tanoj Dadhich
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हुनर
से
काम
लिया
पेंट
ब्रश
नहीं
तोड़ा
बना
लिया
तेरे
जैसा
ही
कोई
रंगों
से
मुझे
ये
डर
है
कि
मिल
जाएगी
तो
रो
दूँगा
मैं
जिस
ख़ुशी
को
तरसता
रहा
हूँ
बरसों
से
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Rahul Gurjar
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किस
तरह
जमा
कीजिए
अब
अपने
आप
को
काग़ज़
बिखर
रहे
हैं
पुरानी
किताब
के
Adil Mansuri
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गिफ़्ट
कर
देता
हूँ
उसको
मैं
किताबें,
लेकिन
उनको
पढ़
लेने
की
मोहलत
नहीं
देता
उसको
Harman Dinesh
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कहाँ
हम
ग़ज़ल
का
हुनर
जानते
हैं
मगर
इस
ज़बाँ
का
असर
जानते
हैं
ये
वो
हुस्न
जिसको
निखारा
गया
है
नया
कुछ
नहीं
हम
ख़बर
जानते
हैं
कि
है
जो
क़फ़स
में
वो
पंछी
रिहा
हो
परिंदें
ज़मीं
के
शजर
जानते
हैं
फ़क़त
रूह
के
नाम
है
इश्क़
लेकिन
बदन
के
हवाले
से
घर
जानते
हैं
फ़ुलाँ
है
फ़ुलाँ
का
यक़ीं
हैं
हमें
भी
सुनो
हम
उसे
सर-ब-सर
जानते
हैं
कि
अब
यूँँ
सिखाओ
न
रस्म-ए-सियासत
झुकाना
कहाँ
है
ये
सर
जानते
हैं
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Neeraj Neer
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सोलह
दिन
पहले
तक
जो
बस
मेरी
थी
सोलह
दिन
के
बाद
वही
'तौबा-तौबा'
Upendra Bajpai
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मौत
के
बाद
का
मंज़र
न
बयाँ
हो
जैसे
ऐसे
मुश्किल
है
ज़माने
से
तेरा
दुख
कहना
Upendra Bajpai
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चल
पड़ा
था
देखकर
मैं
मौत
का
रस्ता
खुला
ऐन
वक़्त-ए-ख़ुदकुशी
पंखे
से
पर
फंदा
खुला
और
फिर
इक
रोज़
उसने
लब
मेरे
लब
पे
रखे
और
फिर
इक
रोज़
मुझपे
मीर
का
मिसरा
खुला
मुझको
रोता
देखने
की
चाह
थी
उसकी
सो
अब
छोड़
देता
हूँ
मैं
अक्सर
रात
दरवाज़ा
खुला
और
फिर
इक
दिन
किसी
से
चैट
उसकी
देख
ली
और
फिर
इक
दिन
हमारी
अक्ल
का
ताला
खुला
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Upendra Bajpai
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मैं
कैसा
मुसव्विर
हूँ,
कैनवास
पे
मेरे
सब
रंग
तेरे
है,
तेरी
तस्वीर
नहीं
है
Upendra Bajpai
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अब
तो
दोनों
के
मुक़द्दर
ही
आज़माने
हैं
है
बॉल
आख़िरी
और
सात
रन
बनाने
हैं
Upendra Bajpai
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