jab kabhi main apni koi | जब कभी मैं अपनी कोई

  - Uday Bansal
जबकभीमैंअपनीकोई
पुरानीलिखीनज़्मउठाऊँ
तोवोकुछबदलीबदलीसीलगतीहै
उसेजितनीबारपढ़ोउतनीहीबार
मेरीरायउसकेबारेमेंबदलनेलगतीहै
किकभीनज़्मजीकोअच्छीलगतीहै
तोकभीअखरतीहै
कभीचेहरेपेमुस्कानतोकभीमाथेपेशिकन
आनेलगतीहै
इसउलझनकाक्याकोईहलहै
क्यामैंअपनेक़लमपेभरोसाकर
अपनीचिंताओंकोनज़र-अंदाज़कर
अपनीनज़्मेंदुनियाकेहवालेकरसकताहूँ
क्यामैंयेजोखमलेसकताहूँ
नतीजाकुछभीहो
मोतीकीतलाशमेंसमुंदरकीगहराइयोंमें
ग़ोता-ख़ोरजानेसेख़ुदकोरोकनहींसकता
बारिशहोहोफ़स्लउगेउगे
किसानबोवाईकरनाहलचलानाछोड़नहींसकता
अगरग़ौरकियाजाए
तोजोखमवोमोललेरहाहै
जोमेरीनज़्मेंपढ़नेवालाहै
  - Uday Bansal
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