kabhi usko ham apni rooh ka paikar samjhte the | कभी उसको हम अपनी रूह का पैकर समझते थे

  - Haider Khan
कभीउसकोहमअपनीरूहकापैकरसमझतेथे
बहुतनादानथेमक़्तलकोअपनाघरसमझतेथे
बड़ेबेजानहोकरदफ़्नहैंदिलमेंकहींपरअब
वहीवादेजिन्हेंहमजानसेबढ़करसमझतेथे
मोहब्बतसेबचाकरख़ुदकोचलतेथेहमेशाहम
मोहब्बतकोहमअपनीराहकीठोकरसमझतेथे
किसीपत्थरसेबढ़करऔरतोकुछभीनहींथावो
वहीइकशख़्सजिसकोहमकभीगौहरसमझतेथे
उसीनेक़ाफ़िलालूटाहमाराकूचसेपहले
जिसेकुछलोगअपनेमुल्ककारहबरसमझतेथे
हमेंयेज़ख़्महरउसशख़्सनेआकरलगाएहैं
जिसेहममुस्कुरातादेखबे-ख़ंजरसमझतेथे
मिलायाथाज़हरउसनेशहरभरकीहवाओंमें
शहरकेलोगजिसकोएकचारा-गरसमझतेथे
अबवोहैअबमैंहूँमगरइकरंजबाकीहै
केहमउसशख़्सकोख़ुदसेकभीबेहतरसमझतेथे
  - Haider Khan
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