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RAAHI
raat bhar jaagna sahi nain hai
raat bhar jaagna sahi nain hai | रात भर जागना सही नइँ है
- RAAHI
रात
भर
जागना
सही
नइँ
है
मौत
अबकी
तू
ही
सुला
मुझको
- RAAHI
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उम्र
शायद
न
करे
आज
वफ़ा
काटना
है
शब-ए-तन्हाई
का
Altaf Hussain Hali
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रात
बाक़ी
थी
जब
वो
बिछड़े
थे
कट
गई
उम्र
रात
बाक़ी
है
Khumar Barabankvi
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शिकस्ता
दिल
शब-ए-ग़म
दर्द
रुसवाई
अरे
इतना
तो
चलता
है
मुहब्बत
में
Sapna Moolchandani
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रात
सोने
के
लिए
दिन
काम
करने
के
लिए
वक़्त
मिलता
ही
नहीं
आराम
करने
के
लिए
Jamal Ehsani
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बिगड़
गई
थी
जो
दुनिया
सॅंवार
दी
हमने
चढ़ा
के
सर
पे
मुहब्बत
उतार
दी
हमने
अँधेरी
रात
किसी
बे-वफ़ा
की
यादों
में
बहुत
तवील
थी
लेकिन
गुज़ार
दी
हमने
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Hameed Sarwar Bahraichi
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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ये
सर्द
रात
ये
आवारगी
ये
नींद
का
बोझ
हम
अपने
शहर
में
होते
तो
घर
चले
जाते
Ummeed Fazli
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क्या
बैठ
जाएँ
आन
के
नज़दीक
आप
के
बस
रात
काटनी
है
हमें
आग
ताप
के
कहिए
तो
आप
को
भी
पहन
कर
मैं
देख
लूँ
मा'शूक़
यूँँ
तो
हैं
ही
नहीं
मेरी
नाप
के
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Farhat Ehsaas
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रात
हो,
चाँद
हो,
बारिश
भी
हो
और
तुम
भी
हो
ऐसा
मुमकिन
ही
नहीं
है
कि
कभी
हो
मिरे
साथ
Faiz Ahmad
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नज़रें
हो
गड़ीं
जिनकी
वसीयत
पे
दिनो-रात
माँ-बाप
कि
'उम्रों
कि
दु'आ
ख़ाक
करेंगे
Asad Akbarabadi
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जश्न
मैं
मौत
का
मनाता
हूँ
मैं
तो
मर
कर
भी
गीत
गाता
हूँ
जल्दबाज़ी
बहुत
रही
होगी,
हाँ
पुरानी
ग़ज़ल
सुनाता
हूँ
जान
करती
रही
मुझे
वा'दा,
मैं
कभी
भी
नहीं
निभाता
हूँ
डगमगाता
नहीं
कभी
सच
से,
मैं
न
ग़लती
कभी
छुपाता
हूँ
आख़िरी
मुशायरे
में
हूँ
झूठ
तो
मैं
नहीं
बताता
हूँ
भर
रहा
दिल
मिरा,
ग़लत
जो
हूँ,
आँख
नम
है,
मगर
हँसाता
हूँ
सोचता
जो
कभी
ख़ुदास
थे
आज
उनको
बहुत
रुलाता
हूँ
ये
अजब
लोग
और
ये
क़िस्से
याद
है
,
हाँ
मगर
भुलाता
हूँ
चाह
कोई
नहीं
मिले
मुझ
सेे
मिल
के
सब
सेे
जो
रूठ
जाता
हूँ
बात
मंज़िल
की
हो
जहाँ
पर
भी
खु़द
को
'राही'
वहाँ
बताता
हूँ
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RAAHI
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जब
कभी
हो
वो
सफ़र
में
वक़्त
कटता
तक
नहीं
है
RAAHI
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उसके
बिना
मरना
नहीं
आया
मुझे
वो
जी
रहे
है
किस
तरह
मेरे
बिना
RAAHI
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शाम
का
तो
आने
का
कह
कर
गई
थी
देखो
मैंने
रोज़ा
खोला
भी
नहीं
है
RAAHI
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दिन
ईद
तक
का
अब
ग़रीबों
को
सताता
है
ख़ुदा
बेबस
बना
बच्चों
को
भी
भूखा
सुला
देती
यहाँ
RAAHI
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