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Tehzeeb Hafi
nahin tha apna magar phir bhi apna apna laga
nahin tha apna magar phir bhi apna apna laga | नहीं था अपना मगर फिर भी अपना अपना लगा
- Tehzeeb Hafi
नहीं
था
अपना
मगर
फिर
भी
अपना
अपना
लगा
किसी
से
मिल
के
बहुत
देर
बाद
अच्छा
लगा
तुम्हें
लगा
था
मैं
मर
जाऊँगा
तुम्हारे
बग़ैर
बताओ
फिर
तुम्हें
मेरा
मज़ाक़
कैसा
लगा
तिजोरियों
पे
नज़र
और
लोग
रखते
हैं
मैं
आसमान
चुरा
लूँगा
जब
भी
मौक़ा
लगा
दिखाती
है
भरी
अलमारियाँ
बड़े
दिल
से
बताती
है
कि
मोहब्बत
में
किसका
कितना
लगा
- Tehzeeb Hafi
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वक़्त,
वफ़ा,
हक़,
आँसू,
शिकवे
जाने
क्या
क्या
माँग
रहे
थे
एक
सहूलत
के
रिश्ते
से
हम
ही
ज़्यादा
माँग
रहे
थे
उसकी
आँखें
उसकी
बातें
उसके
लब
वो
चेहरा
उसका
हम
उसकी
हर
एक
अदास
अपना
हिस्सा
माँग
रहे
थे
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Shikha Pachouly
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शाम
थी
हिज्र
की
हाल
मत
पूछना
आँख
थकने
लगे
तो
जिगर
रो
पड़े
Piyush Mishra 'Aab'
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माँ
जैसे
देखती
हो
तुम
मगर
मैं
तुम्हारी
आँख
का
तारा
नहीं
हूँ
Divy Kamaldhwaj
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ज़िंदगी
इक
फ़िल्म
है
मिलना
बिछड़ना
सीन
हैं
आँख
के
आँसू
तिरे
किरदार
की
तौहीन
हैं
Sandeep Thakur
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तिलिस्म-ए-यार
ये
पहलू
निकाल
लेता
है
कि
पत्थरों
से
भी
ख़ुशबू
निकाल
लेता
है
है
बे-लिहाज़
कुछ
ऐसा
की
आँख
लगते
ही
वो
सर
के
नीचे
से
बाजू
निकाल
लेता
है
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Tehzeeb Hafi
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मेरी
नींदें
उड़ा
रक्खी
है
तुम
ने
ये
कैसे
ख़्वाब
दिखलाती
हो
जानाँ
किसी
दिन
देखना
मर
जाऊँगा
मैं
मेरी
क़स
में
बहुत
खाती
हो
जानाँ
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Subhan Asad
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सुखा
ली
सबने
ही
आँखें
हवा
ए
ज़िन्दगी
से
यहाँ
अब
भी
वही
रोना
रुलाना
चल
रहा
है
Farhat Ehsaas
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सुना
है
लोग
उसे
आँख
भर
के
देखते
हैं
सो
उस
के
शहर
में
कुछ
दिन
ठहर
के
देखते
हैं
Ahmad Faraz
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इतने
दुख
से
भरी
है
ये
दुनिया
आँख
खुलते
ही
आँख
भर
आए
shampa andaliib
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इक
शख़्स
मेरे
घर
पे
नमाज़ों
में
है
लगा
जो
चाहता
है
देखना
अच्छाइयों
के
दिन
Aqib khan
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ये
दुख
अलग
है
कि
उस
सेे
मैं
दूर
हो
रहा
हूँ
ये
ग़म
जुदा
है
वो
ख़ुद
मुझे
दूर
कर
रहा
है
तेरे
बिछड़ने
पर
लिख
रहा
हूँ
मैं
ताज़ा
ग़ज़लें
ये
तेरा
ग़म
है
जो
मुझको
मशहूर
कर
रहा
है
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Tehzeeb Hafi
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ख़ाक
ही
ख़ाक
थी
और
ख़ाक
भी
क्या
कुछ
नहीं
था
मैं
जब
आया
तो
मेरे
घर
की
जगह
कुछ
नहीं
था।
क्या
करूँं
तुझ
सेे
ख़यानत
नहीं
कर
सकता
मैं
वरना
उस
आँख
में
मेरे
लिए
क्या
कुछ
नहीं
था।
ये
भी
सच
है
मुझे
कभी
उसने
कुछ
ना
कहा
ये
भी
सच
है
कि
उस
औरत
से
छुपा
कुछ
नहीं
था।
अब
वो
मेरे
ही
किसी
दोस्त
की
मनकूहा
है
मैं
पलट
जाता
मगर
पीछे
बचा
कुछ
नहीं
था।
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अजीब
ख़्वाब
था
उस
के
बदन
में
काई
थी
वो
इक
परी
जो
मुझे
सब्ज़
करने
आई
थी
वो
इक
चराग़-कदा
जिस
में
कुछ
नहीं
था
मेरा
वो
जल
रही
थी
वो
क़िंदील
भी
पराई
थी
न
जाने
कितने
परिंदों
ने
इस
में
शिरकत
की
कल
एक
पेड़
की
तरक़ीब-ए-रू-नुमाई
थी
हवाओं
आओ
मिरे
गाँव
की
तरफ़
देखो
जहाँ
ये
रेत
है
पहले
यहाँ
तराई
थी
किसी
सिपाह
ने
ख़े
में
लगा
दिए
हैं
वहाँ
जहाँ
ये
मैं
ने
निशानी
तिरी
दबाई
थी
गले
मिला
था
कभी
दुख
भरे
दिसम्बर
से
मिरे
वजूद
के
अंदर
भी
धुँद
छाई
थी
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मुझको
दरवाजे
पर
ही
रोक
लिया
जाता
है
मेरे
आने
से
भला
आप
का
क्या
जाता
है
तुम
अगर
जाने
लगे
हो
तो
पलट
कर
मत
देखो
मौत
लिखकर
तो
क़लम
तोड़
दिया
जाता
है
तुझको
बतलाता
मगर
शर्म
बहुत
आती
है
तेरी
तस्वीर
से
जो
काम
लिया
जाता
है
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Tehzeeb Hafi
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इस
लिए
रौशनी
में
ठंडक
है
कुछ
चराग़ों
को
नम
किया
गया
है
Tehzeeb Hafi
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