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Taj Bhopali
shua-e-mehr ki shabnam se ban nahin sakti
shua-e-mehr ki shabnam se ban nahin sakti | शुआ-ए-मेहर की शबनम से बन नहीं सकती
- Taj Bhopali
शुआ-ए-मेहर
की
शबनम
से
बन
नहीं
सकती
ग़म-ए-जहाँ
की
तिरे
ग़म
से
बन
नहीं
सकती
ये
फ़ैसला
है
हमारा
तिरे
लिए
सय्याद
चमन
में
रह
के
तिरी
हम
से
बन
नहीं
सकती
हयात-ए-जहद-ओ-अमल
से
है
वर्ना
मौत
अच्छी
हयात-ए-गिर्या-ए-मातम
से
बन
नहीं
सकती
हज़ार
कुछ
हो
मगर
ज़ाहिदों
की
जन्नत
में
ये
तज्रबा
है
कि
आदम
से
बन
नहीं
सकती
- Taj Bhopali
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माँ
की
आग़ोश
में
कल
मौत
की
आग़ोश
में
आज
हम
को
दुनिया
में
ये
दो
वक़्त
सुहाने
से
मिले
Kaif Bhopali
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अचानक
छूट
जाती
है
रियासत
अचानक
मौत
आती
है
सभी
को
Meem Alif Shaz
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जहाँ
तक
भाग
पाओ
मौत
हम
सेे
भाग
लो
लेकिन
हमारा
वा'दा
है
इक
दिन
तुम्हें
अपना
करेंगे
हम
Gautam Raj 'Dheeraj'
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घर
से
निकले
थे
हौसला
कर
के
लौट
आए
ख़ुदा
ख़ुदा
कर
के
ज़िंदगी
तो
कभी
नहीं
आई
मौत
आई
ज़रा
ज़रा
करके
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Rajesh Reddy
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मैं
अपनी
मौत
से
ख़ल्वत
में
मिलना
चाहता
हूँ
सो
मेरी
नाव
में
बस
मैं
हूँ
नाख़ुदा
नहीं
है
Pallav Mishra
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एक
ही
हादसा
तो
है
और
वो
ये
कि
आज
तक
बात
नहीं
कही
गई
बात
नहीं
सुनी
गई
Jaun Elia
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वक़्त
करता
है
परवरिश
बरसों
हादिसा
एक
दम
नहीं
होता
Qabil Ajmeri
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इक
प्यासे
की
मौत
हुई
है
अब
पानी
को
दुख
होगा
Shadab Javed
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ज़िन्दगी
इक
हादसा
है
और
कैसा
हादसा
मौत
से
भी
ख़त्म
जिसका
सिलसिला
होता
नहीं
Jigar Moradabadi
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ऐ
ताइर-ए-लाहूती
उस
रिज़्क़
से
मौत
अच्छी
जिस
रिज़्क़
से
आती
हो
परवाज़
में
कोताही
Allama Iqbal
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दिल
तेरी
नज़र
की
शह
पा
कर
मिलने
के
बहाने
ढूँढे
है
गीतों
की
फ़ज़ाएँ
माँगे
है
ग़ज़लों
के
ज़माने
ढूँढे
है
आँखों
में
लिए
शबनम
की
चमक
सीने
में
लिए
दूरी
की
कसक
वो
आज
हमारे
पास
आ
कर
कुछ
ज़ख़्म
पुराने
ढूँढे
है
क्या
बात
है
तेरी
बातों
की
लहजा
है
कि
है
जादू
कोई
हर
आन
फ़ज़ा
में
दिल
उड़
कर
तारों
के
ख़ज़ाने
ढूँढे
है
पहले
तो
छुटे
ये
दैर-ओ-हरम
फिर
घर
छूटा
फिर
मय-ख़ाना
अब
'ताज'
तुम्हारी
गलियों
में
रोने
के
ठिकाने
ढूँढे
है
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Taj Bhopali
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हर
दर्द
से
बाँधे
हुए
रिश्ता
कोई
गुज़रे
क़ातिल
कोई
गुज़रे
न
मसीहा
कोई
गुज़रे
आईना
ब-हर-राह-गुज़र
बन
गईं
आँखें
इक
उम्र
से
बैठे
हैं
कि
तुम
सा
कोई
गुज़रे
वो
तिश्नगी-ए-जाँ
है
कि
सहरा
को
तरस
आए
अब
होंटों
को
छूता
हुआ
दरिया
कोई
गुज़रे
उन
से
भी
इलाज-ए-ग़म
पिन्हाँ
नहीं
होगा
कह
दें
जो
अगर
उन
का
शनासा
कोई
गुज़रे
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Taj Bhopali
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ये
जो
कुछ
आज
है
कल
तो
नहीं
है
ये
शाम-ए-ग़म
मुसलसल
तो
नहीं
है
मैं
अक्सर
रास्तों
पर
सोचता
हूँ
ये
बस्ती
कोई
जंगल
तो
नहीं
है
यक़ीनन
तुम
में
कोई
बात
होगी
ये
दुनिया
यूँँही
पागल
तो
नहीं
है
मैं
लम्हा
लम्हा
मरता
जा
रहा
हूँ
मिरा
घर
मेरा
मक़्तल
तो
नहीं
है
किसी
पर
छा
गया
बरसा
किसी
पर
वो
इक
आवारा
बादल
तो
नहीं
है
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Taj Bhopali
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तुम्हें
कुछ
भी
नहीं
मालूम
लोगों
फ़रिश्तों
की
तरह
मासूम
लोगों
Taj Bhopali
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दर्द
था
हश्र
भी
हज़ार
उठे
सच
न
बोलें
तो
रस्म-ए-दार
उठे
ऐ
ग़म-ए-इश्क़
तुझ
से
हार
गए
जान
दे
कर
भी
शर्मसार
उठे
जाने
किस
दर्द
के
त'अल्लुक़
से
रात
दुश्मन
को
हम
पुकार
उठे
अब
तो
उस
ज़ुल्फ़
की
घटा
छा
जाए
दिल
से
कब
तक
यूँँही
ग़ुबार
उठे
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Taj Bhopali
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