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Taj Bhopali
dard tha hashr bhi hazaar uthe
dard tha hashr bhi hazaar uthe | दर्द था हश्र भी हज़ार उठे
- Taj Bhopali
दर्द
था
हश्र
भी
हज़ार
उठे
सच
न
बोलें
तो
रस्म-ए-दार
उठे
ऐ
ग़म-ए-इश्क़
तुझ
से
हार
गए
जान
दे
कर
भी
शर्मसार
उठे
जाने
किस
दर्द
के
त'अल्लुक़
से
रात
दुश्मन
को
हम
पुकार
उठे
अब
तो
उस
ज़ुल्फ़
की
घटा
छा
जाए
दिल
से
कब
तक
यूँँही
ग़ुबार
उठे
- Taj Bhopali
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हम
को
किस
के
ग़म
ने
मारा
ये
कहानी
फिर
सही
किस
ने
तोड़ा
दिल
हमारा
ये
कहानी
फिर
सही
Masroor Anwar
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आज
है
उनको
आना,
मज़ा
आएगा
फिर
जलेगा
ज़माना,
मज़ा
आएगा
तीर
उनकी
नज़र
के
चलेंगे
कई
दिल
बनेगा
निशाना
मज़ा
आएगा
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Bhaskar Shukla
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शक
है
तुझे
अगर
ये
अब
भी
गुदाज़
है
दिल
तो
सीने
से
कभी
ये
पत्थर
निकाल
मेरा
Abhay Aadiv
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हर
दुख
का
है
इलाज,
उसे
देखते
रहो
सबकुछ
भुला
के
आज
उसे
देखते
रहो
देखा
उसे
तो
दिल
ने
ये
बे-साख़्ता
कहा
छोड़ो
ये
काम
काज
उसे
देखते
रहो
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Aslam Rashid
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हम
को
दिल
से
भी
निकाला
गया
फिर
शहरस
भी
हम
को
पत्थर
से
भी
मारा
गया
फिर
ज़हरस
भी
Azm Shakri
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तुम्हारे
ख़त
को
जलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
ये
दिल
बाहर
निकलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
तुम्हारा
फ़ैसला
है
पास
रुकना
या
नहीं
रुकना
मेरी
क़िस्मत
बदलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
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Tanoj Dadhich
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किस
तरह
'अमानत'
न
रहूँ
ग़म
से
मैं
दिल-गीर
आँखों
में
फिरा
करती
है
उस्ताद
की
सूरत
Amanat Lakhnavi
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रात
यूँँ
दिल
में
तिरी
खोई
हुई
याद
आई
जैसे
वीराने
में
चुपके
से
बहार
आ
जाए
Faiz Ahmad Faiz
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इतनी
सारी
यादों
के
होते
भी
जब
दिल
में
वीरानी
होती
है
तो
हैरानी
होती
है
Afzal Khan
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जैसे
तू
हुक्म
करे
दिल
मिरा
वैसे
धड़के
ये
घड़ी
तेरे
इशारों
से
मिला
रक्खी
है
Anwar Masood
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तुम्हें
कुछ
भी
नहीं
मालूम
लोगों
फ़रिश्तों
की
तरह
मासूम
लोगों
Taj Bhopali
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हर
दर्द
से
बाँधे
हुए
रिश्ता
कोई
गुज़रे
क़ातिल
कोई
गुज़रे
न
मसीहा
कोई
गुज़रे
आईना
ब-हर-राह-गुज़र
बन
गईं
आँखें
इक
उम्र
से
बैठे
हैं
कि
तुम
सा
कोई
गुज़रे
वो
तिश्नगी-ए-जाँ
है
कि
सहरा
को
तरस
आए
अब
होंटों
को
छूता
हुआ
दरिया
कोई
गुज़रे
उन
से
भी
इलाज-ए-ग़म
पिन्हाँ
नहीं
होगा
कह
दें
जो
अगर
उन
का
शनासा
कोई
गुज़रे
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Taj Bhopali
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आज
दिल
सोच
रहा
है
जैसे
मय
हर
इक
ग़म
की
दवा
है
जैसे
जाँ
हथेली
पे
लिए
फिरते
हैं
इक
यही
शर्त-ए-वफ़ा
है
जैसे
कहीं
मोती
कहीं
तारे
कहीं
फूल
दहर
तेरी
ही
क़बा
है
जैसे
दश्त-ए-ग़ुर्बत
में
तिरा
नामा-ए-शौक़
हाथ
में
फूल
खिला
है
जैसे
इस
तरह
चुप
हैं
तिरा
ग़म
ले
कर
ये
भी
क़िस्मत
का
लिखा
है
जैसे
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Taj Bhopali
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ये
जो
कुछ
आज
है
कल
तो
नहीं
है
ये
शाम-ए-ग़म
मुसलसल
तो
नहीं
है
मैं
अक्सर
रास्तों
पर
सोचता
हूँ
ये
बस्ती
कोई
जंगल
तो
नहीं
है
यक़ीनन
तुम
में
कोई
बात
होगी
ये
दुनिया
यूँँही
पागल
तो
नहीं
है
मैं
लम्हा
लम्हा
मरता
जा
रहा
हूँ
मिरा
घर
मेरा
मक़्तल
तो
नहीं
है
किसी
पर
छा
गया
बरसा
किसी
पर
वो
इक
आवारा
बादल
तो
नहीं
है
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Taj Bhopali
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घर
में
तिरे
पैग़ाम
को
तरसें
बाहर
जल्वा-ए-बाम
को
तरसें
तुम
सूरज
और
चाँद
से
खेलो
हम
कि
चराग़-ए-शाम
को
तरसें
तुम
कि
शिकस्त-ए-जाम
के
आदी
हम
कि
शिकस्ता
जाम
को
तरसें
और
अभी
कुछ
रात
है
बाक़ी
और
अभी
आराम
को
तरसें
आज
हज़ारों
काम
हैं
बाक़ी
फिर
भी
हज़ारों
काम
को
तरसें
आज़ादी
के
ऊँचे
सूरज
गलियाँ
तेरे
नाम
को
तरसें
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Taj Bhopali
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