vahii bahaar o khizaan hai mujh men bhi | वही बहार ओ ख़िज़ाँ है मुझ में भी

  - Tabish Kamal
वहीबहारख़िज़ाँहैमुझमेंभी
मुझसेबाहरभी
(आदमीसेअलगनहींहूँ)
शगूफ़ेफूटेंतोख़ूनमेंगीतबोलतेहैं
कभीकभीख़ारकीखटकटीसबनकेहोंटोंसेझाँकतीहै
न-जानेकितनेहीगीतथेजोबहारसेपहले
शाख़कीरगमेंजीरहेथे
जड़ोंकाबुख़्लउनकोखागयाहै
येख़ार,सौतेलेबेटेशाख़ोंके
इनतकआयानहींहैनम
फिरभीजीरहेहैं
(चमकतेसूरजकासारासचउनकेबत्नमेंहै)
तपिशकीशिद्दतकोपीकेसूखेसड़ेहुएहैं
जीरहेहैं
मुझेख़िज़ाँऔरबहारकेराबतोंमेंजीनाहै
फूलकाइल्तिफ़ातकाँटेकेतल्ख़ताने
मिरेहवालेहैं
जड़कानम,आफ़्ताबकीतब
मिरेहुनरमेंहीबोलतीहै
मैंकितनीसतहोंपेजीरहाहूँ
कभीकोईफूलमुस्कुराए
कभीकोईख़ारदिलदुखाए
तोमुझतकआना
येनज़्मदोनोंकामाजराहै
  - Tabish Kamal
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