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Tabassum Kashmiri
jis roz dhoop nikli
jis roz dhoop nikli | जिस रोज़ धूप निकली
- Tabassum Kashmiri
जिस
रोज़
धूप
निकली
और
लोग
अपने
अपने
ठंडे
घरों
से
बाहर
हाथों
में
डाले
सूरज
की
सम्त
निकले
उस
रोज़
तुम
कहाँ
थे
जिस
रोज़
धूप
निकली
और
फूल
भी
खुले
थे
थे
सब्ज़
बाग़
रौशन
अश्जार
ख़ुश
हुए
थे
पत्तों
की
सब्ज़
ख़ुशबू
जब
सब
घरों
में
आई
उस
रोज़
तुम
कहाँ
थे
जिस
रोज़
आसमाँ
पर
मंज़र
चमक
रहे
थे
सूरज
की
सीढ़ियों
पर
उड़ते
थे
ढेरों
पंछी
और
साफ़
घाटियों
पर
कुछ
फूल
भी
खुले
थे
उस
रोज़
तुम
कहाँ
थे
जिस
रोज़
धूप
चमकी
और
फ़ाख़्ता
तुम्हारे
घर
की
छतों
पे
बोली
फिर
मंदिरों
में
आईं
ख़ुशबू
भरी
हवाएँ
और
नन्हे-मुन्ने
बच्चे
तब
आँगनों
में
खेले
उस
रोज़
तुम
कहाँ
थे
जिस
रोज़
धूप
निकली
जिस
रोज़
धूप
निकली
और
अलगनी
पे
डाले
कुछ
सूखने
को
कपड़े
जब
अपने
घर
की
छत
पे
ख़ामोश
मैं
खड़ा
था
तन्हा
उदास
बेलें
और
दोपहर
के
पंछी
कुछ
मुझ
से
पूछते
थे
उस
रोज़
तुम
कहाँ
थे
- Tabassum Kashmiri
अब
ऐसे
ज़ाविए
पर
लौ
रखी
जाने
लगी
है
चराग़ों
के
तले
भी
रोशनी
जाने
लगी
है
नया
पहलू
सलीक़े
से
बयाँ
करना
पड़ेगा
कहानी
अब
तवज्जोह
से
सुनी
जाने
लगी
है
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Khurram Afaq
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दाग़ों
की
बस
दिखा
दी
दिवाली
में
रौशनी
हम
सा
न
होगा
कोई
जहाँ
में
दिवालिया
Hatim Ali Mehr
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उम्र
गुज़री
है
माँजते
ख़ुद
को
साफ़
हैं
पर
चमक
नहीं
पाए
डाल
ने
फूल
की
तरह
पाला
ख़ार
थे
ना
महक
नहीं
पाए
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Vishal Bagh
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अज़
कबीर-ओ-रंग-ए-केसर
और
गुलाल
अब्र
छाया
है
सफ़ेद-ओ-ज़र्द-ओ-लाल
Faez Dehlvi
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जहाँ
रहेगा
वहीं
रौशनी
लुटाएगा
किसी
चराग़
का
अपना
मकाँ
नहीं
होता
Waseem Barelvi
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दिल
से
तो
हर
मोआ'मला
कर
के
चले
थे
साफ़
हम
कहने
में
उन
के
सामने
बात
बदल
बदल
गई
Faiz Ahmad Faiz
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रौशनी
ऐसी
अजब
थी
रंग-भूमी
की
'नसीम'
हो
गए
किरदार
मुदग़म
कृष्ण
भी
राधा
लगा
Iftikhar Naseem
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किस
ने
हमारे
शहर
पे
मारी
है
रौशनी
हर
इक
मकाँ
के
ज़ख़्म
से
जारी
है
रौशनी
Nomaan Shauque
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ये
इश्क़-विश्क़
का
क़िस्सा
तमाम
हो
जाए
सफ़ेद
दाढ़ी
हवस
की
गुलाम
हो
जाए
जवान
लड़कियों
बूढ़ों
से
तुम
रहो
हुश्यार
न
जाने
कौन
कहाँ
आसाराम
हो
जाए
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Paplu Lucknawi
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चाँद
भी
हैरान
दरिया
भी
परेशानी
में
है
अक्स
किस
का
है
कि
इतनी
रौशनी
पानी
में
है
Farhat Ehsaas
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