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Sudarshan Fakir
falsafe ishq men pesh aa.e sawaalon ki tarah
falsafe ishq men pesh aa.e sawaalon ki tarah | फ़लसफ़े इश्क़ में पेश आए सवालों की तरह
- Sudarshan Fakir
फ़लसफ़े
इश्क़
में
पेश
आए
सवालों
की
तरह
हम
परेशाँ
ही
रहे
अपने
ख़यालों
की
तरह
शीशागर
बैठे
रहे
ज़िक्र-ए-मसीहा
ले
कर
और
हम
टूट
गए
काँच
के
प्यालों
की
तरह
जब
भी
अंजाम-ए-मोहब्बत
ने
पुकारा
ख़ुद
को
वक़्त
ने
पेश
किया
हम
को
मिसालों
की
तरह
ज़िक्र
जब
होगा
मोहब्बत
में
तबाही
का
कहीं
याद
हम
आएँगे
दुनिया
को
हवालों
की
तरह
- Sudarshan Fakir
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बिछड़
गया
हूँ
मगर
याद
करता
रहता
हूँ
किताब
छोड़
चुका
हूँ
पढ़ाई
जारी
है
Ali Zaryoun
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कुछ
इस
तरह
से
याद
आते
रहे
हो
कि
अब
भूल
जाने
को
जी
चाहता
है
Akhtar Shirani
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हम
को
यारों
ने
याद
भी
न
रखा
'जौन'
यारों
के
यार
थे
हम
तो
Jaun Elia
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तेरा
बनता
था
कि
तू
दुश्मन
हो
अपने
हाथों
से
खिलाया
था
तुझे
तेरी
गाली
से
मुझे
याद
आया
कितने
तानों
से
बचाया
था
तुझे
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Ali Zaryoun
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इतना
तो
याद
है
इक
वा'दा
किया
था
लेकिन
हम
ने
क्या
वा'दा
किया
था
हमें
ये
याद
नहीं
Bismil Dehlavi
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कुछ
नज़र
आता
नहीं
उस
के
तसव्वुर
के
सिवा
हसरत-ए-दीदार
ने
आँखों
को
अंधा
कर
दिया
Haidar Ali Aatish
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सुनो
हर-वक़्त
इतना
याद
भी
मत
कीजिए
हमको
कहीं
ऐसा
न
हो
की
हिचकियों
में
जाँ
निकल
जाए
Sandeep dabral 'sendy'
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एक
चेहरा
है
जो
आँखों
में
बसा
रहता
है
इक
तसव्वुर
है
जो
तन्हा
नहीं
होने
देता
Javed Naseemi
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जाते
जाते
आप
इतना
काम
तो
कीजे
मिरा
याद
का
सारा
सर-ओ-सामाँ
जलाते
जाइए
Jaun Elia
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कर
रहा
था
ग़म-ए-जहाँ
का
हिसाब
आज
तुम
याद
बे-हिसाब
आए
Faiz Ahmad Faiz
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पत्थर
के
ख़ुदा
पत्थर
के
सनम
पत्थर
के
ही
इंसाँ
पाए
हैं
तुम
शहर-ए-मोहब्बत
कहते
हो
हम
जान
बचा
कर
आए
हैं
Sudarshan Fakir
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आदमी
आदमी
को
क्या
देगा
जो
भी
देगा
वही
ख़ुदा
देगा
मेरा
क़ातिल
ही
मेरा
मुंसिब
है
क्या
मेरे
हक़
में
फ़ैसला
देगा
ज़िन्दगी
को
क़रीब
से
देखो
इसका
चेहरा
तुम्हें
रुला
देगा
हम
सेे
पूछो
दोस्ती
का
सिला
दुश्मनों
का
भी
दिल
हिला
देगा
इश्क़
का
ज़हर
पी
लिया
'फ़ाकिर'
अब
मसीहा
भी
क्या
दवा
देगा
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इश्क़
में
ग़ैरत-ए-जज़्बात
ने
रोने
न
दिया
वर्ना
क्या
बात
थी
किस
बात
ने
रोने
न
दिया
आप
कहते
थे
कि
रोने
से
न
बदलेंगे
नसीब
उम्र
भर
आप
की
इस
बात
ने
रोने
न
दिया
रोने
वालों
से
कहो
उन
का
भी
रोना
रो
लें
जिन
को
मजबूरी-ए-हालात
ने
रोने
न
दिया
तुझ
से
मिल
कर
हमें
रोना
था
बहुत
रोना
था
तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात
ने
रोने
न
दिया
एक
दो
रोज़
का
सदमा
हो
तो
रो
लें
'फ़ाकिर'
हम
को
हर
रोज़
के
सदमात
ने
रोने
न
दिया
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ग़म
बढे़
आते
हैं
क़ातिल
की
निगाहों
की
तरह
तुम
छिपा
लो
मुझे
ऐ
दोस्त,
गुनाहों
की
तरह
अपनी
नज़रों
में
गुनाहगार
न
होते,
क्यूँ
कर
दिल
ही
दुश्मन
हैं
मुख़ालिफ़
के
गवाहों
की
तरह
हर
तरफ़
ज़ीस्त
की
राहों
में
कड़ी
धूप
है
दोस्त
बस
तेरी
याद
के
साए
हैं
पनाहों
की
तरह
जिनके
ख़ातिर
कभी
इल्ज़ाम
उठाये,
"फ़ाकिर"
वो
भी
पेश
आए
हैं
इंसाफ़
के
शाहों
की
तरह
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आप
कहते
थे
कि
रोने
से
न
बदलेंगे
नसीब
उम्र
भर
आप
की
इस
बात
ने
रोने
न
दिया
Sudarshan Fakir
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